नई दिल्ली | 26 जनवरी 2026 – देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A की संवैधानिकता पर एक विभाजित फैसला (Split Verdict) सुनाया है। यह मामला अब एक बड़ी बेंच के पास भेजा गया है।
क्या है यह विवाद?
धारा 17A एक ऐसा प्रावधान है जो पुलिस या जांच एजेंसियों को किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार से पूर्व अनुमति (Prior Sanction) लेने के लिए मजबूर करता है।
- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का रुख: उन्होंने इस धारा को असंवैधानिक करार दिया। उनके अनुसार, यह प्रावधान भ्रष्ट अधिकारियों को एक ‘कवच’ प्रदान करता है और जांच प्रक्रिया में देरी करता है, जिससे सबूत मिटाने का मौका मिल सकता है।
- जस्टिस के.वी. विश्वनाथन का रुख: उन्होंने इसे पूरी तरह रद्द करने के बजाय सुझाव दिया कि जांच की अनुमति सरकार के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र संस्था से ली जानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि इसे पूरी तरह हटाने से ईमानदार अधिकारियों को झूठी शिकायतों से परेशानी हो सकती है।
देशभर में अन्य बड़ी खबरें
- आंध्र प्रदेश में बड़ा एक्शन: तिरुपति रेंज की एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने नायडूपेटा में एक सर्कल इंस्पेक्टर और हेड कांस्टेबल को ₹30,000 की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया।
- चुनावी रैलियों में गूंजा मुद्दा: तमिलनाडु और केरल में आगामी चुनावों के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाया है। उन्होंने विपक्षी दलों पर ‘भ्रष्टाचार और माफिया राज’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
- केरल का रिकॉर्ड: केरल के विजिलेंस ब्यूरो (VACB) ने वर्ष 2025 में भ्रष्टाचार के मामलों में ऐतिहासिक बढ़ोत्तरी दर्ज की है, जिसमें राजस्व विभाग सबसे ऊपर रहा।
विशेषज्ञों की राय: कानूनी जानकारों का मानना है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच इस पर अंतिम फैसला नहीं लेती, तब तक हाई-प्रोफाइल भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की गति धीमी रह सकती है।