नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में शुक्रवार का दिन एक बड़े उलटफेर का गवाह बना। केंद्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण कानून में बदलाव के लिए लाया गया ‘संविधान (131वां संशोधन) बिल 2026’ लोकसभा में वोटिंग के दौरान गिर गया। सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सदन में इस महत्वपूर्ण बिल को पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा। इस हार के साथ ही महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया और डीलिमिटेशन (परिसीमन) को लेकर एक नया संवैधानिक संकट खड़ा होता दिख रहा है।
वोटिंग का गणित और सरकार की विफलता
सदन में शुक्रवार दोपहर बाद कड़ी बहस और हंगामे के बीच जब वोटिंग हुई, तो नतीजे सरकार की उम्मीदों के विपरीत रहे। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए इसके विरोध में 230 वोट डाले।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, किसी भी संविधान संशोधन बिल को पारित करने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत की आवश्यकता होती है। मौजूदा सदन की संख्या के हिसाब से सरकार को लगभग 362 वोटों की दरकार थी, लेकिन वह इस जादुई आंकड़े से 64 वोट दूर रह गई। बिल के गिरते ही विपक्ष ने सदन में ‘महिला विरोधी सरकार’ के नारे लगाए, जबकि सत्ता पक्ष में सन्नाटा पसर गया।
विवाद की जड़: डीलिमिटेशन बनाम तत्काल आरक्षण
इस पूरे विवाद के केंद्र में सरकार का वह प्रस्ताव था, जिसमें कहा गया था कि महिलाओं को मिलने वाला 33 प्रतिशत आरक्षण डीलिमिटेशन (सीटों के नए सिरे से निर्धारण) के बाद ही लागू होगा। सरकार का तर्क था कि चूंकि जनगणना और परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ने वाली है, इसलिए आरक्षण को बढ़ी हुई सीटों के आधार पर लागू करना अधिक वैज्ञानिक और तार्किक होगा। हालांकि, कांग्रेस समेत पूरे इंडिया (I.N.D.I.A.) गठबंधन और कई क्षेत्रीय दलों ने इसका कड़ा विरोध किया। विपक्ष की मुख्य मांग थी कि महिला आरक्षण को लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों पर ही तुरंत लागू किया जाना चाहिए। विपक्ष का आरोप था कि सरकार ‘डीलिमिटेशन’ की शर्त जोड़कर इस कानून को अनिश्चितकाल के लिए लटकाना चाहती है। विपक्षी नेताओं ने तर्क दिया कि यदि सरकार की नीयत साफ है, तो वह 2029 के आम चुनाव में मौजूदा सीटों पर ही महिलाओं को हक क्यों नहीं दे रही?
गृह मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री का बयान
वोटिंग से पहले हुई लंबी चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और डीलिमिटेशन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने आश्वासन दिया था कि आरक्षण जल्द से जल्द जमीन पर उतरेगा। हालांकि, बिल गिरने के तुरंत बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने घोषणा की कि सरकार फिलहाल बाकी के दोनों संबंधित संशोधन बिलों को आगे नहीं बढ़ाएगी। उन्होंने इस विफलता के लिए विपक्ष के ‘अड़ियल रुख’ को जिम्मेदार ठहराया। रिजिजू ने कहा, “हम महिलाओं को उनका हक देना चाहते थे, लेकिन विपक्ष ने राजनीतिक स्वार्थ के चलते एक ऐतिहासिक अवसर को रोक दिया है।”
कानूनी उलझन: 16 अप्रैल 2026 की अधिसूचना
गौरतलब है कि महिला आरक्षण अधिनियम 2023 आधिकारिक तौर पर गुरुवार, 16 अप्रैल 2026 से लागू हो चुका है। कानून मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, यह कानून अब देश के गजट में है। लेकिन 131वें संशोधन बिल के गिरने से इसे लागू करने की ‘मोडस ऑपरेंडी’ (कार्यप्रणाली) पर सवाल खड़े हो गए हैं। चूंकि मूल कानून में प्रावधान था कि आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा, और सरकार उस प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए ही यह नया संशोधन लाई थी, अब यह स्पष्ट नहीं है कि चुनाव आयोग बिना नए संशोधन के आरक्षण को कैसे प्रभावी बनाएगा।
विपक्ष की जीत और भविष्य की राह
विपक्षी खेमे में इस बिल के गिरने को एक बड़ी नैतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी सांसदों का कहना है कि यह सरकार की ‘मनमानी’ पर लगाम है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब सरकार के पास दो रास्ते बचे हैं: या तो वह विपक्ष की मांग मानते हुए बिना डीलिमिटेशन के आरक्षण लागू करने का नया बिल लाए, या फिर इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाए।
निष्कर्ष
131वां संशोधन बिल गिरना केवल एक विधायी हार नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनावी राजनीति के समीकरणों को भी बदल सकता है। देश की आधी आबादी, जो लंबे समय से संसद में अपनी भागीदारी का इंतजार कर रही है, अब इस बात पर नजर रखेगी कि सरकार और विपक्ष इस गतिरोध को कैसे सुलझाते हैं। क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाएं 33% सीटों पर लड़ पाएंगी, या यह मुद्दा एक बार फिर फाइलों और तारीखों के जाल में उलझ जाएगा?