19 April 2026 | New delhi
अभिषेक यादव प्रबंध निदेशक
सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम हालिया संबोधन ने देश के राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर हैरानी जता रहे हैं कि पीएम ने जिस आक्रामक अंदाज में इस संबोधन का उपयोग विपक्षी दलों को घेरने के लिए किया, वैसा पूर्व में किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया था। अपने भाषण में पीएम मोदी ने कांग्रेस के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक को सीधे निशाने पर लिया, जिसे एक्सपर्ट्स आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं।

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु पर टिकी नजरें
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम के इस रुख के पीछे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की महिला वोटर्स को साधने की सोची-समझी रणनीति है।
पश्चिम बंगाल: यहाँ 23 और 29 अप्रैल को अंतिम दो चरणों का मतदान होना है। 2021 में मुख्य विपक्षी दल बनने के बाद बीजेपी इस बार ममता बनर्जी के किले में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रही है।
तमिलनाडु: यहाँ 23 अप्रैल को सभी सीटों पर एक साथ वोटिंग होनी है। दक्षिण भारत में विस्तार की योजना बना रही बीजेपी के लिए तमिलनाडु एक बड़ी चुनौती और प्राथमिकता बना हुआ है।
131वें संशोधन विधेयक और ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’
संसद के विशेष सत्र के जरिए लाए गए 131वें संशोधन विधेयक को लेकर विपक्ष सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहा है। सबसे बड़ा विवाद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ के क्रियान्वयन को लेकर है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, “पीएम को संविधान संशोधन बिल पास न करा पाने के लिए नहीं, बल्कि महिलाओं के नाम पर ‘परिसीमन’ का कुटिल प्रस्ताव लाने के लिए माफी मांगनी चाहिए। उनकी नीयत साफ नहीं बल्कि खोटी है।”
देरी पर उठाए सवाल

विपक्ष का सबसे तीखा सवाल इस कानून की टाइमिंग को लेकर है। जयराम रमेश ने पूछा कि जो अधिनियम सितंबर 2023 में सर्वसम्मति से पास हो गया था, उसे 30 महीने की लंबी देरी के बाद 16 अप्रैल 2026 की देर रात को क्यों अधिसूचित किया गया? विपक्ष का आरोप है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की अधिसूचना जारी करना केवल राजनीतिक लाभ लेने का एक ‘बेशर्मी और कपट’ से भरा प्रयास है।
महिला आरक्षण पर छिड़ा सियासी संग्राम: 131वां संशोधन बिल लोकसभा में गिरा, बीजेपी और विपक्ष आमने-सामने
देश की राजनीति में महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation) को लेकर टकराव चरम पर पहुंच गया है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लागू होने और उसके बाद 131वें संविधान संशोधन बिल के लोकसभा में गिरने से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। जहाँ सरकार इसे विपक्ष की ‘महिला विरोधी’ मानसिकता बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे दक्षिण भारत के राजनीतिक प्रभाव को कम करने की साजिश करार दिया है।
ढाई साल बाद लागू हुआ अधिनियम
सितंबर 2023 में संसद से पारित होने के करीब 30 महीने बाद, केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल 2026 को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संशोधन) की अधिसूचना जारी की। इसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने का रास्ता तो साफ हो गया, लेकिन पेंच 131वें संशोधन बिल में फंस गया।
क्या था विवाद का मुख्य केंद्र?
सरकार द्वारा प्रस्तावित 131वें संशोधन बिल में प्रावधान था कि महिला आरक्षण परिसीमन (Delimitation) के बाद ही लागू होगा। विपक्ष ने इस पर दो बड़े सवाल उठाए
मौजूदा सीटों पर आरक्षण क्यों नहीं?: विपक्ष की मांग थी कि आरक्षण लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों पर ही तुरंत दिया जाना चाहिए, न कि परिसीमन के बाद बढ़ने वाली सीटों का इंतजार किया जाए।
दक्षिण भारत की चिंता: विपक्षी दलों का आरोप है कि जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन से दक्षिण भारत के पांच राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व घट जाएगा, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा।
लोकसभा में गिरा बिल: मौखिक आश्वासन पर भरोसा नहीं
संशोधन बिल पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता थी, लेकिन विपक्ष के कड़े विरोध के चलते सरकार इसे लोकसभा में पास नहीं करा पाई। सदन में चर्चा के दौरान सरकार के मंत्रियों ने आश्वासन दिया कि परिसीमन से किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा और सभी राज्यों में सीटें 50 फ़ीसदी तक बढ़ाई जाएंगी। हालांकि, विपक्ष ने इसे केवल ‘मौखिक आश्वासन’ बताकर खारिज कर दिया और लिखित गारंटी की मांग पर अड़ा रहा।

बीजेपी का विपक्ष पर तीखा हमला
बिल गिरने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने विपक्ष पर जोरदार हमला बोला है। बीजेपी का कहना है कि विपक्ष ने ऐतिहासिक अवसर को रोककर देश की महिलाओं के साथ धोखा किया है। वहीं, विपक्षी गठबंधन का कहना है कि सरकार ‘महिला सशक्तीकरण’ की आड़ में परिसीमन का कुटिल प्रस्ताव थोपना चाहती थी।
131वें संशोधन बिल के गिरने से अब महिला आरक्षण के भविष्य और आगामी परिसीमन की प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा दोनों पक्षों के लिए एक बड़ा चुनावी हथियार बनने वाला है।
महिला आरक्षण पर महासंग्राम: बीजेपी ने विपक्ष के विरोध को बताया ‘दानवी अट्टाहास’ स्मृति ईरानी ने घेरा कांग्रेस का ‘दोहरा चेहरा’
131वें संविधान संशोधन बिल के लोकसभा में गिरने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। बीजेपी ने विपक्षी दलों के रवैये को ‘महिला विरोधी’ करार देते हुए आरोप लगाया है कि उन्होंने देश की करोड़ों महिलाओं के लिए खुले अधिकारों के दरवाजों को जबरन बंद कर दिया है।
‘दानवी अट्टाहास’ और विपक्ष की घेराबंदी
बिल गिरने के बाद बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्ष की खुशी को ‘अमानवीय’ बताया। उन्होंने कहा, “संसद में बिल गिरने पर विपक्षी पार्टियों को जिस तरह तालियां बजाते देखा, वह एक प्रकार का ‘दानवी अट्टाहास’ जैसा प्रतीत होता है। यह दृश्य देश की हर महिला के हृदय को दुखाने वाला था।” त्रिवेदी ने कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और सपा को सीधे तौर पर महिला अधिकारों का दुश्मन करार देते हुए कहा कि पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए का संकल्प अब भी अटूट है।
स्मृति ईरानी का कांग्रेस पर ‘दोहरेपन’ का आरोप
शनिवार को कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस के जवाब में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि विपक्ष का ‘क्रूर चेहरा’ देश के सामने उजागर हो चुका है।
ईरानी ने कांग्रेस के विरोधाभासों पर सवाल उठाते हुए कहा:
- “कांग्रेस एक तरफ कहती है कि वह 2023 के बिल का समर्थन करती है जिसमें परिसीमन (Delimitation) का जिक्र है, लेकिन दूसरी तरफ कहती है कि उसे परिसीमन पर भरोसा नहीं है।”
- उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस को न देश की संवैधानिक व्यवस्थाओं में विश्वास है, न संसद में और न ही देश की महिलाओं पर।
सियासी समीकरण और भविष्य की राह
बीजेपी अब इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। पार्टी का स्पष्ट संदेश है कि सरकार महिला आरक्षण के लिए ईमानदार थी, लेकिन विपक्ष के अड़ंगे की वजह से इसे कानूनी रूप नहीं दिया जा सका। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे चुनावी राज्यों में बीजेपी इस मुद्दे को महिला मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर उठाने वाली है।
विशेष विश्लेषण: “राजनीतिक मंच बना राष्ट्र के नाम संबोधन,” महिला आरक्षण और परिसीमन की ‘क्रोनोलॉजी’ पर उठे सवाल
महिला आरक्षण और 131वें संविधान संशोधन बिल को लेकर जारी घमासान के बीच अब वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने सरकार की मंशा और बिल की ‘टाइमिंग’ पर गंभीर सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ जैसे गरिमामयी मंच का इस्तेमाल सीधे तौर पर राजनीति और विपक्ष को घेरने के लिए किया है।
‘क्रोनोलॉजी’ और ढाई साल की देरी पर सवाल
शरद गुप्ता ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मशहूर जुमले “क्रोनोलॉजी समझिए” का जिक्र करते हुए सरकार की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनके विश्लेषण के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
नोटिफिकेशन में देरी: ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ सितंबर 2023 में पास हुआ था, लेकिन इसे ढाई साल तक अधिसूचित (Notify) नहीं किया गया। चुनाव से ठीक पहले इसे अचानक लागू करना संदेह पैदा करता है।
जनगणना बनाम परिसीमन: पहले नियम था कि पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन। लेकिन अब सरकार कह रही है कि जनगणना बाद में होती रहेगी, पहले परिसीमन कर लिया जाए।
विपक्ष की पुरानी मांग: 2023 में ही विपक्ष ने मांग की थी कि जनगणना का इंतजार किए बिना पिछली जनगणना के आधार पर आरक्षण लागू कर दिया जाए, जिसे सरकार ने तब ठुकरा दिया था।
चुनावी राज्यों पर नजर और ‘इमरजेंसी’ सत्र की टाइमिंग
विश्लेषकों का मानना है कि बजट सत्र खत्म होने के तुरंत बाद अचानक ‘इमरजेंसी सत्र’ बुलाने के पीछे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव मुख्य कारण हैं।
शरद गुप्ता के अनुसार, “तीन साल से जिस कानून को ठंडे बस्ते में रखा गया, उसे चुनाव से ठीक पहले लाने की क्या इमरजेंसी थी? सरकार को पता था कि उनके पास संसद में पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं और विपक्ष साथ नहीं है। अगर मंशा साफ होती, तो विपक्ष से बातचीत कर आम सहमति बनाई जाती, न कि अकेले बिल लाकर उन्हें दोषी ठहराया जाता।”
दबाव की राजनीति और विज्ञापनों का सहारा
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि सरकार ने बिल लाने के साथ-साथ अखबारों में पत्र, अपील और विज्ञापनों की झड़ी लगा दी। इसे सीधे तौर पर विपक्ष पर नैतिक दबाव बनाने और जनता के बीच उन्हें ‘महिला विरोधी’ साबित करने की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महिला आरक्षण अब केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव से पहले एक बड़ा ‘इलेक्टोरल गेमप्लान’ बन चुका है, जहाँ सरकार और विपक्ष दोनों ही एक-दूसरे को मात देने की कोशिश में हैं।
किसी भी संवैधानिक संशोधन को पास करवाने के लिए सदन में दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है. बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन के पास संसद में ये आंकड़ा नहीं था.
शरद गुप्ता कहते हैं कि बीजेपी को पहले से ही आंदेशा था कि वो इस बिल को पास नहीं करवा पाएंगे और उन्होंने आगे की तैयारी पहले ही कर रखी थी.

शरद गुप्ता के मुताबिक़, बीजेपी का ये क़दम राजनीतिक था. वह कहते हैं, “जैसे ही बिल पास नहीं हुआ बीजेपी ने प्रदर्शन करने शुरू कर दिए. कुल मिलाकर ये राजनीतिक क़दम था और अब उसका ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाने की कोशिश हो रही है. राष्ट्र के नाम संबोधन भी होगा, सड़कों पर प्रदर्शन भी होगा, ताकि पश्चिम बंगाल के चुनाव पर उसका प्रभाव नज़र आए.”
शरद गुप्ता कहते हैं, “अगर बीजेपी की मंशा साफ़ थी तो उसने अपनी पार्टी के भीतर 33 फीसदी महिलाओं को टिकट देकर एक मिसाल कायम क्यों नहीं की?”
294 विधानसभा सीटों वाले राज्य पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने 52 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है. वहीं कांग्रेस ने 39 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. बीजेपी की ओर से 33 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है.
शरद गुप्ता ने कहा, “अगर ये राष्ट्र के नाम संबोधन था तो महिलाओं की बात होती. अगर आप महिलाओं के हितैषी हैं तो आप क़ानून के पास होने का इंतज़ार क्यों कर रहे हैं. आप अपनी पार्टी में 33 फीसदी महिलाओं को टिकट देते और उदाहरण सेट करते. अगर मंशा सही है तो 543 सीटों में ही आरक्षण लागू करें.”
“जब 50 फ़ीसदी महिलाएं हैं तो फिर 33 फीसदी आरक्षण ही क्यों मिले. आधी आबादी को आधा हक़ ही मिलना चाहिए. ये सब राजनीति है. राष्ट्र के नाम संबोधन को राजनीति के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.”
बिल पर बहस के दौरान टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने मांग की, “आप अभी 50 प्रतिशत महिला आरक्षण का बिल ला सकते हैं, अभी जो संख्या है उसमें 50 प्रतिशत महिला आरक्षण कर दीजिए. सभी विपक्ष के लोग आपके साथ होंगे. लेकिन आपकी ऐसी मंशा नहीं है.”
महिला आरक्षण विवाद: “ईरान-इजरायल युद्ध जैसे संकट को छोड़ राजनीति में उलझा राष्ट्र के नाम संबोधन”
विश्लेषकों ने उठाए गंभीर सवाल
महिला आरक्षण बिल और 131वें संविधान संशोधन को लेकर छिड़ा सियासी संग्राम थमने का नाम नहीं ले रहा है। वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों ने अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन की विषयवस्तु और बीजेपी की आंतरिक नीतियों पर कड़े प्रहार किए हैं।
आचार संहिता के बीच विपक्षी दलों का नाम क्यों?”
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री ने पीएम मोदी द्वारा संबोधन में टीएमसी (TMC) और डीएमके (DMK) का नाम लेने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, “जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, वहां आचार संहिता लागू है। ऐसे में पीएम का बार-बार इन दलों को निशाना बनाना क्या दर्शाता है? राष्ट्र के नाम संबोधन का विषय देश के सामने खड़े वास्तविक संकट होने चाहिए थे।”
युद्ध का संकट और प्राथमिकताएं
अत्री ने ध्यान दिलाया कि वर्तमान में ईरान और खाड़ी देशों में छिड़ी जंग की वजह से भारत भारी आर्थिक और सामरिक संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा, “संबोधन का मुख्य मुद्दा यह होना चाहिए था कि खाड़ी देशों में युद्ध से भारत को क्या चुनौतियां हैं और सरकार उनसे कैसे निपटेगी। लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर बात तक नहीं की गई, बल्कि पूरा ध्यान राजनीति पर रहा।”

बीजेपी और आरएसएस के इतिहास पर प्रहार
हेमंत अत्री ने बीजेपी और उसके वैचारिक संगठन आरएसएस (RSS) के ढांचे पर सवाल उठाते हुए इसे ‘महिला विरोधी’ करार दिया:
आरएसएस: “100 साल के इतिहास में आरएसएस की कार्यकारिणी में किसी एक महिला का नाम बता दीजिए।”
बीजेपी अध्यक्ष: “क्या बीजेपी में आज तक कोई महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी है? दिल्ली को छोड़कर, फिलहाल किसी भी बीजेपी शासित राज्य में कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं है।”
विरोधाभास: उन्होंने यह भी पूछा कि जब ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ 2023 में ही पास हो गया था और नोटिफाई भी कर दिया गया था, तो बीजेपी किस आधार पर कह रही है कि विपक्ष ने उसे गिरा दिया?
नतीजों पर टिकी निगाहें
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का मानना है कि बीजेपी इस पूरे विवाद को विपक्ष के खिलाफ कितना भुना पाएगी, इसका असली फैसला पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावी नतीजों से होगा।
विश्लेषकों का तर्क है कि अगर सरकार की मंशा वास्तव में महिला सशक्तिकरण की होती, तो वह कानून का इंतजार किए बिना अपनी पार्टी के भीतर महिलाओं को 33% टिकट देकर एक उदाहरण पेश करती।
देश के बुद्धिजीवी वर्ग में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि क्या राष्ट्र के नाम संबोधन जैसे सर्वोच्च मंच का इस्तेमाल चुनावी राज्यों की राजनीति को साधने के लिए किया जा रहा है, जबकि देश के सामने कई अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक चुनौतियां खड़ी हैं।