सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2026
दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर चल रहा प्रदर्शन अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को प्रदर्शनकारी छात्रों से मिलने पहुंचे कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया। खबरों के मुताबिक, इस कार्रवाई में कुल 10 लोगों को हिरासत में लिया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय में छात्र अधिकारों, पुलिस की कार्रवाई और विवादित नारों को लेकर बहस तेज हो गई है।
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि छात्रों का प्रदर्शन मुख्य रूप से छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग को लेकर शुरू हुआ था। लेकिन परिसर की दीवारों पर कश्मीर से जुड़े विवादित नारे लिखे मिलने और विपक्षी सांसदों के हिरासत में लिए जाने के बाद मामला राजनीतिक रंग लेने लगा है।
आखिर जामिया में छात्र प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र 12 अक्टूबर से छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ चुनाव की तारीखों और पूरी प्रक्रिया का आधिकारिक कार्यक्रम जारी करे।
छात्रों के मुताबिक, विश्वविद्यालय में आखिरी बार वर्ष 2005 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। इसके बाद 2006 में छात्रसंघ भंग कर दिया गया था। तब से छात्रों के पास अपनी समस्याओं को उठाने के लिए पहले की तरह निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों का संगठन नहीं है।
छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को भी अपनी समस्याओं पर आवाज उठाने और प्रशासन के सामने अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अवसर मिलना चाहिए। उनका मानना है कि चुना हुआ छात्रसंघ फीस, छात्रावास, छात्रवृत्ति, उपस्थिति से जुड़े नियमों और अन्य शैक्षणिक समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने में मदद कर सकता है।
प्रदर्शनकारियों की मांग सिर्फ चुनाव की घोषणा तक सीमित नहीं है। वे आंदोलन में शामिल विद्यार्थियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने और विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारियों को उनके पदों से हटाने की मांग भी उठा रहे हैं।
इमरान मसूद और मोहिबुल्लाह नदवी को क्यों हिरासत में लिया गया?
शुक्रवार, 23 अक्टूबर को कांग्रेस सांसद इमरान मसूद प्रदर्शन कर रहे छात्रों से मिलने और उनकी मांगों का समर्थन करने जामिया पहुंचे थे। इसी दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। समाजवादी पार्टी के सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को भी छात्रों से मिलने जाते समय हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने कहा कि दोनों सांसद बिना अनुमति विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने और प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस के अनुसार, उन्हें परिसर के बाहर से एहतियातन हिरासत में लिया गया। दूसरी ओर, प्रदर्शन से जुड़े लोगों ने पुलिस पर छात्रों और नेताओं के साथ धक्का-मुक्की करने का आरोप लगाया। नदवी ने भी अपने साथ कथित बदसलूकी की शिकायत की।
दीवारों पर विवादित नारे मिलने से कैसे बढ़ा विवाद?
छात्रसंघ चुनाव की मांग के बीच जामिया परिसर की दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ जैसे नारे लिखे मिलने की खबर सामने आई। इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे प्रदर्शन को लेकर विवाद और बढ़ गया।
इन नारों को लेकर सवाल उठने लगे कि इन्हें किसने लिखा और क्या इनका छात्र आंदोलन से कोई संबंध है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित लोगों की पहचान करने की बात कही। अधिकारियों के अनुसार, कुछ जगहों पर सीसीटीवी कैमरों के तारों से छेड़छाड़ किए जाने की बात भी सामने आई।
हालांकि, इन नारों को लेकर सभी पक्षों के दावे एक जैसे नहीं हैं। प्रदर्शनकारी छात्र जसिम अली ने आरोप लगाया कि इन नारों के जरिए शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। यह उनका आरोप है; उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि नारे किसने लिखे या इसके पीछे किसका हाथ था।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी विवादित नारों से खुद को अलग किया। उन्होंने कहा कि वह भारत को तोड़ने की बात करने वाले किसी भी नारे का समर्थन नहीं करते। उन्होंने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए कहा कि इस तरह के पोस्टर लगाकर छात्रों के आंदोलन को भटकाने की कोशिश की जा रही है।
इसलिए पूरे मामले में जरूरी है कि विवादित नारों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों और छात्रसंघ चुनाव की मूल मांग को एक ही बात न माना जाए। नारे किसने लिखे, इसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच और ठोस सबूत जरूरी हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या कदम उठाए?
छात्रों के लगातार प्रदर्शन के बीच जामिया प्रशासन ने छात्रसंघ के नए संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की है। इस समिति को छात्रसंघ के पहले भंग होने की परिस्थितियों, संबंधित कानूनी फैसलों और छात्रसंघ चुनाव से जुड़े दिशा-निर्देशों का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई है।
खबरों के अनुसार, समिति को विद्यार्थियों समेत संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श करके 20 दिसंबर 2026 तक मसौदा सौंपना है। प्रशासन की ओर से प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्रों पर शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा करने की बात भी कही गई है।
लेकिन छात्रों को प्रशासन के इन कदमों पर आपत्ति है। उनका कहना है कि संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए समिति बनाना और चुनाव की तारीख घोषित करना दो अलग-अलग बातें हैं। छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय पहले चुनाव का आधिकारिक कार्यक्रम जारी करे और उसके बाद आगे की प्रक्रिया पूरी करे।
यही इस विवाद का सबसे बड़ा कारण है। प्रशासन ने चुनाव की प्रक्रिया से जुड़ा कदम उठाया है, लेकिन प्रदर्शनकारी तत्काल और स्पष्ट समय-सीमा चाहते हैं। दोनों पक्षों के बीच इस अंतर को दूर किए बिना आंदोलन खत्म होने के आसार स्पष्ट नहीं हैं।
आम छात्रों पर क्या पड़ रहा है असर?
विश्वविद्यालय में लगातार चल रहे प्रदर्शन और सुरक्षा बढ़ाए जाने से परिसर का माहौल तनावपूर्ण हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, प्रवेश के दौरान जांच बढ़ाई गई है और कुछ जगहों पर आवाजाही को लेकर सख्ती की गई है। प्रदर्शन के दौरान गेट नंबर सात के पास भी पहले तनाव की स्थिति बन चुकी है।
ऐसी परिस्थितियों में छात्रों को कक्षाओं, विभागों तक पहुंचने और सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों में परेशानी हो सकती है। हालांकि, सभी कक्षाएं बंद होने या पूरे विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी तरह ठप होने का दावा उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
छात्रों का आंदोलन उनके प्रतिनिधित्व और अधिकारों से जुड़ा है, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी परिसर में सुरक्षा, पढ़ाई और सामान्य व्यवस्था बनाए रखना भी है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच बातचीत और स्पष्ट निर्णय जरूरी हैं, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई पर लंबे समय तक असर न पड़े।
राजनीतिक दलों ने क्या रुख अपनाया?
इमरान मसूद के जामिया पहुंचने और हिरासत में लिए जाने के बाद विपक्षी नेताओं की भूमिका भी चर्चा में आ गई है। विपक्षी नेताओं ने छात्रों की मांगों का समर्थन करते हुए छात्रसंघ की बहाली और प्रशासन के साथ बातचीत की जरूरत पर जोर दिया है।
वहीं, इमरान मसूद ने विवादित नारों का समर्थन करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे मामलों की जांच होनी चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि नारों से जुड़े विवाद के कारण छात्रों की छात्रसंघ चुनाव की मांग को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि, इस पूरे मामले को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा की राजनीति के रूप में देखना सही नहीं होगा। यहां छात्रों की मांगें, विश्वविद्यालय प्रशासन का निर्णय, पुलिस की कार्रवाई और विवादित नारों की जांच जैसे अलग-अलग मुद्दे शामिल हैं। किसी भी राजनीतिक दल के आरोपों या दावों को अंतिम सच मानने से पहले तथ्यों की पुष्टि जरूरी है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबकी नजर इस बात पर है कि जामिया प्रशासन छात्रसंघ चुनाव को लेकर कोई निश्चित कार्यक्रम जारी करता है या नहीं। यदि प्रशासन और छात्रों के बीच सहमति बनती है, तो आंदोलन खत्म करने का रास्ता निकल सकता है। लेकिन अगर चुनाव की तारीखों पर फैसला नहीं होता, तो प्रदर्शन आगे भी जारी रह सकता है।
दूसरी ओर, विवादित नारे लिखने वालों की पहचान और सीसीटीवी कैमरों से कथित छेड़छाड़ के मामले में जांच के नतीजे भी महत्वपूर्ण होंगे। जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार था।
निष्कर्ष: जामिया विश्वविद्यालय का यह विवाद सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ में लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव नहीं होने और विद्यार्थियों की प्रतिनिधित्व संबंधी मांगों का मुद्दा है। प्रशासन ने समिति बनाकर प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन छात्र तत्काल चुनाव कार्यक्रम चाहते हैं। अब समाधान इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रशासन छात्रों की मांगों पर कितनी स्पष्ट समय-सीमा देता है और दोनों पक्ष बातचीत के जरिए किस तरह आगे बढ़ते हैं।
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