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समस्तीपुर बैलगाड़ी बरात!

अब भला बैलगाड़ी से भी कोई बरात जाता है? लेकिन बिहार के एक शहर (समस्तीपुर) में बुधवार की शाम कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला…

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मोहिनी कुमारी

न डीजे की कानफोड़ू आवाज, न लग्जरी गाड़ियों की लाइन… बल्कि बैलों की सधी चाल, लकड़ी की बैलगाड़ियों की चरमराहट और लोकगीतों की मधुर तान।

शहर की सड़कों पर निकली यह अनोखी बरात किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं थी। यह देसी और इको-फ्रेंडली थीम वाली शादी शहर के जाने-माने कारोबारी प्रदीप सेठ के पुत्र आलोक की थी।

गोला रोड स्थित होटल से जब शाम ढलते ही बरात निकली, तो लोगों को लगा जैसे समय पीछे लौट आया हो। दूल्हा रथ पर सवार था… सिर पर सेहरा, चेहरे पर सादगी भरी मुस्कान और परंपरा को जीने का संकल्प।

उसके पीछे 22 सजी-धजी बैलगाड़ियों का काफिला धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। हर बैलगाड़ी को पारंपरिक अंदाज में सजाया गया था। कुछ में सोफा सेट लगे थे, तो कुछ में गद्दों पर बैठे बाराती लोकधुनों पर झूमते नजर आए।
करीब दो किलोमीटर का सफर तय कर यह अनोखी बरात मथुरापुर स्थित गजराज पैलेस पहुंची। तब तक यह सिर्फ एक शादी नहीं, बल्कि शहरभर में चर्चा का विषय बन चुकी थी।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश
इस बरात की सबसे बड़ी खासियत थी—पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त आयोजन। न धुआं…न शोर-शराबा…
सिर्फ उल्लास, अपनापन और प्रकृति के साथ सामंजस्य।

कार्यक्रम संयोजक और पशुप्रेमी महेंद्र प्रधान ने बताया कि इस आयोजन के लिए आसपास के गांवों से 35 जोड़ी बैलगाड़ियों को बुलाया गया था। सभी को पारंपरिक तरीके से सजाया गया।

जब बरात सड़कों से गुजरी, तो राहगीर ठिठक गए। मोबाइल कैमरे निकल आए। किसी ने कहा— “यह हुई असली शादी”, तो किसी ने इसे परंपरा और आधुनिक सोच का सुंदर संगम बताया।

दूल्हे की प्रतिक्रिया
दूल्हा आलोक ने कहा कि कुछ अलग करने की इच्छा थी, लेकिन यह आयोजन इतना खास बन जाएगा, इसकी कल्पना नहीं की थी।

शोर और दिखावे के इस दौर में यह देसी थीम वाली शादी यह संदेश दे गई कि सादगी, संस्कृति और पर्यावरण के साथ भी उत्सव उतना ही भव्य हो सकता हैं।

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