सावधान नेशन न्यूज़
मोहिनी कुमारी
राजधानी दिल्ली की हवा अब सिर्फ धुंध नहीं, बल्कि एक ऐसा अदृश्य खतरा बन चुकी है जो हर सांस के साथ सेहत पर वार कर रहा है। विशेषज्ञों का दावा है कि एयर पॉल्यूशन का असर महामारी से भी कहीं ज्यादा व्यापक और घातक हो सकता है।
राजस्थान के अलवर में आयोजित “अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026” के मंच से, Anil Agarwal Environment Training Institute में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि दिल्ली की आबोहवा धीरे-धीरे लोगों की उम्र घटा रही है।
प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ Dr. Sanjeev Bagai ने बताया कि सर्दियों के पांच महीनों में दिल्ली का एक आम नागरिक अनजाने में लगभग 9,000 सिगरेट के बराबर प्रदूषित धुआं अपने फेफड़ों में भर लेता है।
उन्होंने तुलना करते हुए कहा—जहां COVID-19 के चार सालों में भारत में लगभग छह लाख लोगों की जान गई, वहीं वायु प्रदूषण हर साल 10 से 20 लाख मौतों की वजह बन रहा है। यानी यह खतरा कई गुना बड़ा और लगातार बना हुआ है।
अगर वैश्विक आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया भर में हर साल 50 लाख से 80 लाख से ज्यादा मौतें खराब हवा से जुड़ी बताई जाती हैं।
सेहत पर तुरंत असर
मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक:
15 मिनट के भीतर सांस लेने में परेशानी महसूस हो सकती है।
24 से 48 घंटे के संपर्क में रहने पर दिल और दिमाग से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
कई दिनों तक लगातार एक्सपोज़र गंभीर हृदय संबंधी आपात स्थिति पैदा कर सकता है।
PM 2.5: सबसे खतरनाक कण
PM 2.5 में मामूली 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी से मृत्यु दर में लगभग 4% वृद्धि देखी गई है।
35 माइक्रोग्राम बढ़ने पर यह जोखिम 20% से ज्यादा तक जा सकता है।
जहरीली गैसों में हल्की बढ़ोतरी भी हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि दिल्ली में होने वाली कुल मौतों में लगभग 11% के पीछे PM 2.5 की अहम भूमिका है।
बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित
सुबह का समय, जब प्रदूषण का स्तर ऊंचा होता है, उसी वक्त बच्चे स्कूल के लिए निकलते हैं। नतीजा—उनके विकसित हो रहे फेफड़े सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कई परिवार बच्चों की सेहत को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, प्रदूषित कण फेफड़ों की एल्वियोली को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और धीरे-धीरे हृदय, किडनी व मस्तिष्क पर असर पड़ता है।
साफ है, यह खतरा दिखता नहीं, लेकिन असर गहरा छोड़ता है। सवाल यही है—क्या दिल्ली की हवा को साफ करने के लिए अब निर्णायक कदम उठाए जाएंगे, या यह ‘साइलेंट किलर’ यूं ही हमारी सांसों पर भारी पड़ता रहेगा।
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