गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश | 5 अप्रैल 2026
गाज़ीपुर में सामने आए 67 करोड़ रुपये के साइबर ठगी मामले में पुलिस जांच के दौरान एक बेहद शातिर और सुनियोजित नेटवर्क का खुलासा हुआ है। इस गिरोह ने आम लोगों की मजबूरी, तकनीक और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल कर करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दिया। आइए समझते हैं कि यह पूरा खेल कैसे चलता था।
🔍 1. पहले टारगेट की पहचान
साइबर अपराधी सबसे पहले ऐसे लोगों को निशाना बनाते थे जिन्हें पैसों की जरूरत होती थी।
ये लोग बेरोजगार, गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर होते थे
सोशल मीडिया या लोकल संपर्क के जरिए उनसे दोस्ती की जाती थी
फिर उन्हें कुछ पैसे या कमीशन का लालच दिया जाता था
📄 2. दस्तावेज हासिल करना
इसके बाद गिरोह उन लोगों से उनके जरूरी डॉक्यूमेंट ले लेता था:
आधार कार्ड
पैन कार्ड
पासपोर्ट साइज फोटो
इन दस्तावेजों के जरिए अपराधी उनकी पहचान का इस्तेमाल अपने काम में करते थे!
🏢 3. फर्जी कंपनी और बैंक खाता
पीड़ित के नाम पर MSME (उद्योग पंजीकरण) कराया जाता था
फिर GST (वस्तु एवं सेवा कर) में रजिस्ट्रेशन किया जाता था
इसके बाद उसी नाम पर बैंक में चालू खाता (Current Account) खुलवाया जाता था
👉 ऐसे खातों को “म्यूल अकाउंट” कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल सिर्फ पैसे घुमाने के लिए होता है।
📱 4. बैंक की पूरी एक्सेस गिरोह के पास
खाता खुलने के बाद उसकी पूरी जानकारी गिरोह को दे दी जाती थी:
इंटरनेट बैंकिंग यूजरनेम और पासवर्ड
रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर और ईमेल
OTP एक्सेस
यह सारी जानकारी टेलीग्राम जैसे ऐप के जरिए गैंग तक पहुंचाई जाती थी।
⚠️ 5. मोबाइल में खतरनाक APK फाइल इंस्टॉल
गिरोह पीड़ित के मोबाइल में कुछ खास ऐप इंस्टॉल कराता था, जैसे:
Crown SMS
WP DS (डब्ल्यूपे डीएस)
👉 ये ऐप असल में मैलवेयर (virus) होते थे, जो:
मोबाइल पर आने वाले सभी OTP पढ़ लेते थे
SMS और बैंक अलर्ट सीधे अपराधियों तक भेज देते थे
इससे अपराधी बिना रोक-टोक बैंक अकाउंट ऑपरेट कर सकते थे।
💻 6. टेलीग्राम से पूरा ऑपरेशन
पूरा नेटवर्क टेलीग्राम ग्रुप्स के जरिए चलता था:
यहीं पर अकाउंट डिटेल शेयर होती थी
यहीं से पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश दिए जाते थे
“Crown Pay” जैसी फर्जी कंपनी भी इसी प्लेटफॉर्म से ऑपरेट होती थी
💰 7. क्रिप्टोकरेंसी से मनी लॉन्ड्रिंग
जब म्यूल अकाउंट में पैसे आते थे, तो उन्हें तुरंत
क्रिप्टो ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (जैसे Binance, KuCoin) पर भेज दिया जाता था
फिर पैसे को क्रिप्टोकरेंसी (जैसे USDT) में बदल दिया जाता था
👉 इससे पैसे का ट्रैक करना बहुत मुश्किल हो जाता था।
कमीशन और नेटवर्क
गिरोह के हर सदस्य की अलग-अलग क्रिप्टो ID होती थी
कमीशन भी USDT (क्रिप्टो) में लिया जाता था
पूरा नेटवर्क एक संगठित कंपनी की तरह काम करता था
निष्कर्ष
यह साइबर ठगी का मॉडल बेहद खतरनाक और आधुनिक तकनीक पर आधारित है। इसमें:
✔ गरीब लोगों को “म्यूल अकाउंट” बनाकर इस्तेमाल किया जाता है
✔ मोबाइल हैकिंग और OTP चोरी की जाती है
✔ क्रिप्टोकरेंसी के जरिए पैसे को छिपाया जाता है
👉 यही कारण है कि ऐसी ठगी का पता लगाना और पैसे वापस लाना बहुत मुश्किल हो जाता है।