6 से ज्यादा बच्चे तो कटेगा नाम? नंदीग्राम के मोहम्मदपुर में चुनाव आयोग के नोटिस पर मचा कोहराम।
नंदीग्राम: मतदाता सूची से नाम कटने पर फूटा गुस्सा, ‘म
नंदीग्राम (पश्चिम बंगाल): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले नंदीग्राम के मोहम्मदपुर गाँव में भारी तनाव और हताशा का माहौल है। लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में भागीदारी करने के बजाय, यहाँ के सैकड़ों ग्रामीण अपने हाथों में चुनाव आयोग (EC) का नोटिस लिए गलियों में न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
मोहम्मदपुर की मामोनी ख़ातून उन हजारों मतदाताओं में से एक हैं, जिनका नाम मतदाता सूची से काट दिया गया है। मामोनी की गलती कोई अपराध नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर द्वारा निर्धारित एक तकनीकी मापदंड है। आयोग ने उनका नाम इसलिए हटाया क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी और उनके माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर है।
उम्र का गणित और लोकतंत्र का संकट
मामोनी के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। वे कहती हैं, “मैं इतने सालों से वोट दे रही हूं, अचानक मेरी उम्र और मेरे माता-पिता की उम्र का अंतर आयोग के लिए समस्या बन गया। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अपनी नागरिकता और पहचान कैसे साबित करूं, जबकि मेरे पास सारे वैध दस्तावेज हैं।”
यह अकेले मामोनी की कहानी नहीं है। चुनाव आयोग ने इस बार ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न’ (SIR) के तहत एक विशेष AI-आधारित सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया है। इस सॉफ़्टवेयर का उद्देश्य मतदाता सूची में मौजूद विसंगतियों को दूर करना था। इसके लिए कुछ कड़े पैमाने तय किए गए थे
1. मतदाता और माता-पिता की उम्र में 15 वर्ष से कम का अंतर होना।
2. दादा-दादी और मतदाता की उम्र में 40 वर्ष से कम का अंतर।
3. एक ही पूर्वज (पिता) के नाम से 6 से अधिक मतदाताओं का जुड़ा होना।
जियारुल खां का सवाल: बाकी बच्चे किसे अपना पिता बताएं?
गाँव के ही 30 वर्षीय जियारुल खां की व्यथा अलग है। उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस थमाया है क्योंकि उनके पिता अजीज खां को मतदाता सूची में छह से ज्यादा लोगों ने अपना पिता बताया है। जियारुल बताते हैं कि उनके पिता ने दो शादियां की थीं और उनके कुल 10 बच्चे हैं।
जियारुल गुस्से में पूछते हैं, “आयोग का कहना है कि एक पिता के 6 से ज्यादा बच्चे मतदाता सूची में नहीं हो सकते। मेरे वालिद के 10 बच्चे हैं, तो क्या बाकी के 4 बच्चे किसी और को अपना पिता बता दें? यह तर्क से परे है।” जियारुल जैसे कई परिवारों के लिए यह नियम एक बड़ी मुसीबत बन गया है, जो उनकी पारिवारिक संरचना और सामाजिक वास्तविकता को नजरअंदाज करता है।
मुस्लिम बहुल इलाकों में अधिक असर
नंदीग्राम में इस कार्रवाई ने राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग भी ले लिया है। आंकड़ों के अनुसार, नंदीग्राम की पूरक सूची (Supplementary List) से हटाए गए 2,826 नामों में से लगभग 95.5% मुस्लिम समुदाय से हैं। मोहम्मदपुर, शमशाबाद और अन्य अल्पसंख्यक बहुल गाँवों में यह प्रतिशत और भी अधिक है।
विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि ‘संदेहास्पद’ (Suspect) के नाम पर एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है ताकि वे मतदान प्रक्रिया से बाहर हो जाएं। हालांकि, प्रशासन का कहना है कि यह एक पूरी तरह तकनीकी प्रक्रिया है और इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है।
कानूनी लड़ाई और समय की कमी
मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँचा, जहाँ अदालत ने प्रभावित लोगों को अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की अनुमति दी। लेकिन असली समस्या समय की है। चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल 2026 को मतदाता सूची को ‘फ्रीज’ कर दिया है। इसका मतलब है कि अब 23 अप्रैल के मतदान के लिए सूची में कोई बदलाव संभव नहीं है।
मोहम्मदपुर के ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें नोटिस बहुत देरी से मिले, जिससे उन्हें अपनी बात रखने या दस्तावेजों में सुधार करने का पर्याप्त समय नहीं मिला। कइयों के नाम अब ‘अधिनिर्णय’ (Adjudication) की श्रेणी में डाल दिए गए हैं, जिससे वे मतदान केंद्र तक तो जा सकेंगे, लेकिन वोट नहीं डाल पाएंगे।
खामोश होती चुनावी गूँज
नंदीग्राम, जो हमेशा से अपने राजनीतिक उत्साह के लिए जाना जाता रहा है, इस बार एक अजीब सी खामोशी और डर के साये में है। मोहम्मदपुर की गलियों में चुनावी नारों की जगह अब चुनाव आयोग के नोटिसों और वकीलों की सलाहों पर चर्चा हो रही है।
मामोनी ख़ातून और जियारुल खां जैसे मतदाताओं के लिए 23 अप्रैल की सुबह उम्मीद की नहीं, बल्कि मायूसी की होगी। उनके लिए लोकतंत्र के मायने अब सिर्फ कागजों के उस पुलिंदे तक सिमट गए हैं, जिसे वे अपनी पहचान साबित करने के लिए प्रशासन के सामने पेश कर रहे हैं।
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रिपोर्ट: स्थानीय संवाद सूत्र, नंदीग्राम