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ईरान का सत्ता संघर्ष: मोजतबा ख़ामेनेई की चुप्पी और नेतृत्व का गहराता संकट

तेहरान | विशेष रिपोर्ट | 25 April 2026

अमेरिका और इसराइल के साथ छिड़ी जंग के बीच, ईरान अब केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं लड़ रहा, बल्कि वह अपने भीतर सत्ता के सबसे गहरे और जटिल संकट से जूझ रहा है। आधिकारिक तौर पर, सत्ता का हस्तांतरण हो चुका है; दिवंगत नेता के पुत्र मोजतबा ख़ामेनेई अब देश के सर्वोच्च नेता हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इन कागज़ी दावों से बिल्कुल अलग और चिंताजनक तस्वीर पेश करती है।

अदृश्य नेतृत्व और शक्ति का निर्वात (Vacuum)

ईरान के इस्लामी गणराज्य में ‘सर्वोच्च नेता’ का पद केवल एक प्रशासनिक पद नहीं है, बल्कि यह वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द जंग, शांति और देश की हर बड़ी रणनीति घूमती है। मोजतबा ख़ामेनेई का इस पद पर आसीन होना संवैधानिक रूप से तो वैध है, लेकिन व्यावहारिक रूप से वे एक ‘अदृश्य’ शासक बनकर रह गए हैं।

28 फ़रवरी के बाद से मोजतबा ख़ामेनेई का कोई भी सार्वजनिक दर्शन नहीं हुआ है। न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य अंतर्राष्ट्रीय स्रोतों से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती हमलों में वे गंभीर रूप से घायल हुए थे, जिनमें चेहरे पर आई चोटें भी शामिल हैं, जिससे उन्हें बोलने में कठिनाई हो रही है। यह कमी ईरान की राजनीति में एक बड़ा ‘शक्ति निर्वात’ पैदा कर रही है। उनके पिता, अली ख़ामेनेई, अपने भाषणों, रणनीतिक बैठकों और गुटों के बीच प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के लिए जाने जाते थे, जो सत्ता के संकेत देने का उनका तरीका था। मोजतबा के पास फिलहाल वह क्षमता नदारद दिखती है। नतीजा यह है कि पूरा सिस्टम बिना किसी स्पष्ट निर्देश के काम कर रहा है।

बंटा हुआ नेतृत्व: ट्रंप का आकलन और ईरानी यथार्थ

अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान के नेतृत्व को ‘आपस में बंटा हुआ’ करार दिया है। हालांकि, ईरानी सरकार ने इसे खारिज करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। हाल ही में देश के सभी मोबाइल उपभोक्ताओं को भेजे गए एक सरकारी संदेश में दावा किया गया, “ईरान में कट्टरपंथी या उदारवादी जैसी कोई चीज नहीं है। यहाँ केवल एक राष्ट्र है, एक ही मार्ग है।”

यह संदेश एकता का प्रदर्शन करने की एक हताश कोशिश थी, लेकिन इसके पीछे की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद रखने के मोजतबा ख़ामेनेई के लिखित बयान और विदेश मंत्रालय के विरोधाभासी कदमों के बीच जो खाई है, वह दिखाती है कि देश के फैसले लेने वाली मशीनरी में तालमेल पूरी तरह खत्म हो चुका है।

राष्ट्रपति बनाम संसद अध्यक्ष: सत्ता की लड़ाई

ईरान की वर्तमान राजनीति का सबसे पेचीदा पहलू राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के बीच का अंतर्संबंध है।

  • मसूद पेज़ेश्कियान: एक उदारवादी छवि के साथ सत्ता में आए पेज़ेश्कियान इस समय एक ऐसी कठपुतली की तरह दिख रहे हैं जो कूटनीति का चेहरा तो है, लेकिन नीति निर्धारण में उनकी कोई अहम भूमिका नहीं है। वे शासन के साथ खुद को ढालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कोई स्वतंत्र रुख अपना पाने में नाकाम रहे हैं।
  • अब्बास अराग़ची और कूटनीति का मजाक: विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची जब होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर बयान देते हैं और फिर उसे वापस लेते हैं, तो यह दुनिया को यह संदेश जाता है कि ईरानी राजनयिकों के पास सैन्य मामलों पर कोई नियंत्रण नहीं है।
  • मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ का उदय: इस अस्पष्टता के बीच, पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर और मौजूदा संसद अध्यक्ष ग़ालिबाफ़ एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं। वे सक्रिय हैं, जनता से संवाद कर रहे हैं और जंग को एक ‘व्यावहारिक’ चश्मे से पेश कर रहे हैं। हालांकि, उनकी स्थिति भी अधर में है क्योंकि उन्हें स्पष्ट तौर पर सर्वोच्च नेता का उत्तराधिकार नहीं मिला है। वे मोजतबा के नाम का इस्तेमाल तो कर रहे हैं, लेकिन क्या उनके पास सर्वोच्च नेता की पूरी ‘वैधता’ है? यह बड़ा सवाल है।

क्या ईरान ‘ऑटो-पायलट’ पर है?

जानकारों का मानना है कि ईरान अभी बिखराव (Collapse) की स्थिति में नहीं है। देश अभी भी अखंड है और व्यवस्था काम कर रही है। सेना, सरकार और संसद अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इन सभी के पास ‘गंतव्य’ का कोई स्पष्ट नक्शा नहीं है।

राजनीतिक व्यवस्था में संकेतों (Signals) की बहुत अहमियत होती है। एक ऐसी व्यवस्था में जो शीर्ष से मिलने वाले इशारों पर चलती हो, वहां शीर्ष की चुप्पी पूरे देश को ‘फ्रीज’ कर देती है। होर्मुज़ स्ट्रेट जैसी महत्वपूर्ण सामरिक जगहों पर ईरान अपनी ताकत का इस्तेमाल करने के लिए संघर्ष कर रहा है, क्योंकि कोई यह तय करने वाला नहीं है कि अगली कार्रवाई का दायरा क्या होगा।

भविष्य की अनिश्चितता

ईरान की मौजूदा स्थिति को एक ऐसे जहाज की तरह देखा जा सकता है जिसका कप्तान गायब है, लेकिन चालक दल अभी भी काम कर रहा है। यह व्यवस्था बाहरी दबाव के आगे झुक नहीं रही है, लेकिन यह आगे भी नहीं बढ़ रही है।

क्या मोजतबा ख़ामेनेई कभी अपनी बीमारी से उबरकर सार्वजनिक जीवन में लौट पाएंगे? क्या ग़ालिबाफ़ की बढ़ती सक्रियता एक ‘सैन्य-राजनीतिक तख्तापलट’ का संकेत है, जहाँ सेना पूरी तरह से बागडोर संभाल लेगी? या फिर पेज़ेश्कियान जैसे मध्यममार्गी नेता किसी तरह व्यवस्था को स्थिर करने में सफल होंगे?

इन सवालों के जवाब फिलहाल तेहरान की बंद कमरों की बैठकों में कहीं दबे हुए हैं। ईरान अभी भी दबाव झेल रहा है, लेकिन यह कब तक चलेगा, यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है। एक बात तो तय है: ईरान का भविष्य उस ‘स्पष्टता’ पर टिका है जो इस समय पूरी तरह नदारद है।

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