सावधान नेशन न्यूज
तरुण कश्यप
नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नैतिकता के आधार पर सदन की कार्यवाही से खुद को अलग कर लिया है। विपक्षी दलों द्वारा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद, श्री बिरला ने निर्णय लिया है कि जब तक इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, वे न तो सदन में आएंगे और न ही अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे।
मुख्य बातें:
क्या है पूरा विवाद?
- नैतिकता का हवाला: ओम बिरला ने कहा कि चूंकि उनके पद और निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं, इसलिए वे जांच प्रक्रिया पूरी होने तक पीठासीन अधिकारी की भूमिका नहीं निभाएंगे।
- 9 मार्च को होगी चर्चा: लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन, यानी 9 मार्च 2026 को होने की संभावना है।
- विपक्ष के आरोप: कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों (कुल 118 सांसद) ने स्पीकर पर “पक्षपातपूर्ण आचरण” और विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने से रोकने का आरोप लगाते हुए Article 94(c) के तहत नोटिस दिया है।
- संवैधानिक स्थिति: हालांकि नियम अध्यक्ष को सदन में रहने और चर्चा में भाग लेने की अनुमति देते हैं, लेकिन बिरला ने स्वेच्छा से इसे “पद की गरिमा” के लिए सही नहीं माना।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया जा रहा है। हाल ही में, पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे की पुस्तक के अंश उद्धृत करने से रोके जाने के बाद गतिरोध बढ़ गया। वहीं, सत्ता पक्ष ने विपक्षी सांसदों पर स्पीकर के चेंबर में दुर्व्यवहार करने का भी आरोप लगाया है।
निष्कर्ष:
लोकसभा की कार्यवाही अब उपाध्यक्ष या पैनल के अन्य सदस्यों द्वारा संचालित की जाएगी। बजट सत्र का यह दूसरा हिस्सा भारतीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है, क्योंकि दशकों बाद किसी लोकसभा अध्यक्ष को इस तरह के परीक्षण का सामना करना पड़ रहा है।