सावधान नेशन न्यूज़
मोहिनी कुमारी
बिहार: बिहार राज्य की विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया गया है। अब असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती लिखित परीक्षा के आधार पर की जाएगी। इसके साथ ही इंटरव्यू को भी प्रक्रिया में शामिल रखा गया है, जिसके लिए 40 अंक निर्धारित किए गए हैं। राज्य सरकार के इस फैसले को उच्च शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
दरअसल, बिहार की विश्वविद्यालयों में लंबे समय से असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्तियों को लेकर विवाद और सवाल उठते रहे हैं। कई बार यह आरोप लगाए गए कि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और इंटरव्यू के आधार पर चयन में पक्षपात की संभावना रहती है। इन्हीं शिकायतों और विवादों को ध्यान में रखते हुए अब राज्य सरकार और संबंधित आयोग ने नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव करने का निर्णय लिया है।
नई व्यवस्था के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती के लिए उम्मीदवारों को पहले लिखित परीक्षा देनी होगी। यह लिखित परीक्षा विषय आधारित होगी, जिसमें उम्मीदवारों के विषय ज्ञान, शोध क्षमता और शिक्षण योग्यता का मूल्यांकन किया जाएगा। लिखित परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले उम्मीदवारों को ही आगे की प्रक्रिया यानी इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा।
जानकारी के मुताबिक इंटरव्यू के लिए कुल 40 अंक निर्धारित किए गए हैं। यानी अब चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा को ज्यादा महत्व दिया जाएगा, जबकि इंटरव्यू की भूमिका सीमित कर दी गई है। इससे यह उम्मीद की जा रही है कि योग्य और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को ज्यादा मौका मिलेगा और चयन प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष बनेगी।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस नई व्यवस्था से विश्वविद्यालयों में बेहतर शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। अब केवल इंटरव्यू के आधार पर चयन नहीं होगा, बल्कि उम्मीदवारों की शैक्षणिक क्षमता और विषय की समझ का भी सही तरीके से मूल्यांकन किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने में मददगार साबित हो सकता है। क्योंकि लिखित परीक्षा के माध्यम से उम्मीदवारों के वास्तविक ज्ञान और तैयारी का पता लगाया जा सकेगा। इससे विश्वविद्यालयों में ऐसे शिक्षक पहुंचेंगे जो अपने विषय में मजबूत पकड़ रखते हों और छात्रों को बेहतर शिक्षा दे सकें।
हालांकि इस फैसले को लेकर कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए हैं। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि शिक्षण कार्य केवल लिखित परीक्षा के आधार पर नहीं आंका जा सकता। इसके लिए शिक्षण कौशल, संवाद क्षमता और शोध कार्य को भी महत्व देना जरूरी है। इसलिए इंटरव्यू और अन्य शैक्षणिक उपलब्धियों को भी उचित वेटेज दिया जाना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में अभ्यर्थी इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। उनका कहना है कि लिखित परीक्षा होने से चयन प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी और निष्पक्ष बनेगी। साथ ही मेरिट के आधार पर उम्मीदवारों का चयन हो सकेगा, जिससे मेहनत करने वाले छात्रों को फायदा मिलेगा।
बताया जा रहा है कि नई भर्ती प्रक्रिया को लागू करने की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं और जल्द ही इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं। इसके बाद विश्वविद्यालयों में लंबे समय से खाली पड़े असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों को भरने की प्रक्रिया भी तेज होने की संभावना है।
गौरतलब है कि बिहार के कई विश्वविद्यालयों में वर्षों से असिस्टेंट प्रोफेसर के हजारों पद खाली पड़े हैं, जिससे पढ़ाई और शोध कार्य प्रभावित हो रहा है। ऐसे में सरकार का यह कदम विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि नई व्यवस्था कब से लागू होती है और भर्ती प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ाई जाती है।
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