सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 2 अक्टूबर 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और कुछ नागरिक समूहों का विरोध पिछले कुछ दिनों में तेज हुआ है। विवाद का मुख्य केंद्र Special Intensive Revision (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदाता सूची में नाम जुड़ने-हटने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर उठे सवाल हैं।
हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी है। इसके बावजूद आयोजकों और समर्थक संगठनों की ओर से प्रदर्शन का आह्वान किया गया है और दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी की गई है।
क्या है पूरा मामला?
ज्ञानेश कुमार वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वे मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर हैं और उनके साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी आयोग का हिस्सा हैं।
विवाद की सबसे बड़ी वजह SIR प्रक्रिया है। इसके तहत मतदाता सूचियों की व्यापक स्तर पर जांच और पुनरीक्षण किया जा रहा है। उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना है, लेकिन इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर विपक्ष और नागरिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं।
विपक्ष का आरोप है कि प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जा रहा है। इसलिए यह कहना कि सभी हटाए गए नाम गलत तरीके से हटाए गए, अभी तथ्य के रूप में स्थापित नहीं है।
विवाद तब बढ़ा जब आयोग के अंदर आपत्तियों की खबर सामने आई
सितंबर में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट में Form 6, मतदाता डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े निर्णयों का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर सवाल उठाए और कथित तौर पर यह चिंता जताई कि कुछ निर्णय उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।
यही रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक हमला तेज कर दिया।
लेकिन यहां दूसरा पक्ष भी समझना जरूरी है।
चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि SIR समेत आयोग के फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे और सभी निर्णय सर्वसम्मत थे। आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों को उस तरह स्वीकार नहीं किया, जैसा विपक्ष ने प्रस्तुत किया।
इसलिए अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित होगा कि आयोग के भीतर कुछ मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई है, लेकिन इन आपत्तियों का अर्थ यह साबित होना नहीं है कि चुनाव आयोग ने अवैध तरीके से चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया।
Form 6 को लेकर भी उठा विवाद
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में SIR से संबंधित कुछ अतिरिक्त सवाल जोड़े जाने पर भी विवाद हुआ।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं से पुराने SIR में स्वयं या माता-पिता/दादा-दादी के नाम से जुड़ी जानकारी से संबंधित विकल्प मांगे गए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी।
बाद में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से छूटे लोगों और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के लिए 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने का फैसला किया। इसमें सामान्य Form 6 के जरिए नाम जोड़ने और BLO के माध्यम से लोगों तक पहुंचने की व्यवस्था की गई है।
यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि मतदाता सूची को लेकर उठे सवालों के बाद आयोग ने सुधारात्मक कदम भी घोषित किए हैं।
विपक्ष क्यों कर रहा है प्रदर्शन?
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक एवं छात्र संगठनों की प्रमुख मांग है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाई जाए और ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा दें।
विपक्ष SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, चुनावी डेटा के प्रबंधन और आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी और कुछ अन्य विपक्षी समूहों ने भी इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया है।
कुछ संगठनों ने इसे केवल ज्ञानेश कुमार का मुद्दा न मानकर मतदाता के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़कर देखा है।
2 अक्टूबर को दिल्ली में क्या होने वाला है?
गांधी जयंती के दिन यानी 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का कार्यक्रम बनाया गया था। इस कार्यक्रम में AISA, राज्यसभा सांसद मनोज झा और वकील प्रशांत भूषण से जुड़े आयोजकों का नाम सामने आया है।
प्रदर्शन की मुख्य मांग ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और उनके इस्तीफे की बताई गई है। लेकिन दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की आशंका को देखते हुए नई दिल्ली इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई।
रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने लगभग 3,000 से 4,000 लोगों के संभावित जुटने का अनुमान लगाया था। इसके कारण बैरिकेडिंग और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की व्यवस्था की गई।
दिल्ली में कुछ मेट्रो स्टेशनों को भी अस्थायी रूप से बंद रखने की व्यवस्था की गई है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार 11 मेट्रो स्टेशनों को प्रदर्शन के मद्देनजर अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की गई, हालांकि कुछ स्टेशनों पर इंटरचेंज सुविधा जारी रखी गई।
इसके अलावा नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 163 के तहत निषेधात्मक आदेश लागू किए जाने की भी रिपोर्ट है।
मुंबई में भी विरोध की तैयारी
दिल्ली के अलावा मुंबई में भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध का ऐलान किया गया है। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 2 अक्टूबर से आंदोलन शुरू करने की घोषणा की थी।
मुंबई के शिवाजी पार्क में प्रदर्शन की योजना को लेकर भी पुलिस की अनुमति का सवाल सामने आया। पुलिस ने बताया कि शिवाजी पार्क को लेकर पहले के न्यायिक आदेशों के कारण वहां सामान्य तरीके से प्रदर्शन की अनुमति देना संभव नहीं है और आयोजकों को वैकल्पिक स्थान तलाशने की सलाह दी गई।
वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और मनसे की ओर से 4 अक्टूबर को मुंबई में चुनाव आयोग के खिलाफ मार्च की घोषणा की गई है।
आरोपों की सच्चाई क्या है?
इस पूरे विवाद में सबसे जरूरी बात यह है कि विपक्ष के आरोप और सिद्ध तथ्य अलग-अलग चीजें हैं।
विपक्ष का आरोप है कि SIR और मतदाता सूची में बदलाव से वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हुए हैं तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी है।
वहीं चुनाव आयोग का पक्ष है कि चुनावी प्रक्रिया कानून के अनुसार चल रही है और आयोग के फैसले संवैधानिक एवं निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत लिए जाते हैं। आयोग ने आंतरिक असहमति की रिपोर्टों के बावजूद SIR सहित अपने निर्णयों को सर्वसम्मत बताया है।
इसी बीच आयोग ने ECINet और मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी मामलों की समीक्षा के लिए कदम उठाए हैं और पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान भी शुरू किया है।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना सही होगा कि CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध वास्तविक है और कई विपक्षी दल व संगठन इसमें शामिल हैं, लेकिन प्रदर्शन में लगाए जा रहे सभी राजनीतिक आरोप अभी न्यायिक या स्वतंत्र जांच से सिद्ध तथ्य नहीं हैं।
मामला अब केवल राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं
इस विवाद का एक कानूनी पहलू भी सामने आया है। ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किए जाने की खबर है और अदालत में इस मामले से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई की दिशा में घटनाक्रम आगे बढ़ रहा है।
इस वजह से आने वाले समय में यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहकर चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची की पारदर्शिता और निर्वाचन आयोग की निर्णय लेने की व्यवस्था से जुड़े संवैधानिक सवालों तक पहुंच सकता है।
निष्कर्ष
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मौजूदा विरोध की जड़ में मुख्य रूप से SIR, मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव, Form 6 में किए गए बदलाव, चुनावी डेटा के प्रबंधन और चुनाव आयोग के भीतर कथित असहमति जैसे मुद्दे हैं।
2 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को पुलिस की अनुमति नहीं मिली है, फिर भी आयोजकों की ओर से विरोध का आह्वान जारी है और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है। मुंबई में भी अलग-अलग संगठनों ने आंदोलन का ऐलान किया है।
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