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भारतीय कूटनीति की बड़ी जीत

 नई दिल्ली/मुंद्रा
तरुण कश्यप

पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। भारतीय ध्वज वाले दो बड़े LPG टैंकर—शिवालिक और नंदा देवी—शनिवार तड़के सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को पार कर गए हैं। शिपिंग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि ये जहाज अब भारतीय बंदरगाहों की ओर बढ़ रहे हैं।

राजनयिक प्रयासों का फल
सूत्रों के अनुसार, यह सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान के बीच हुई बातचीत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के कूटनीतिक प्रयासों का परिणाम है। ईरान ने एक दुर्लभ अपवाद के रूप में भारतीय जहाजों को इस रास्ते से गुजरने की अनुमति दी है, जबकि अन्य देशों के जहाजों के लिए यह मार्ग अत्यधिक जोखिम भरा बना हुआ है।

ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय नौसेना की निगरानी
ये दोनों जहाज शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) के हैं और संयुक्त रूप से 92,700 टन से अधिक LPG लेकर आ रहे हैं। शिवालिक के 16 मार्च को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट और नंदा देवी के 17 मार्च को कांडला पोर्ट पहुँचने की उम्मीद है। इस पूरी यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना के युद्धपोत ‘ऑपरेशन संकल्प’ के तहत क्षेत्र में कड़ी निगरानी रख रहे हैं ताकि जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

क्यों महत्वपूर्ण है यह रास्ता?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे व्यस्त तेल और गैस आपूर्ति मार्ग है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% LPG आयात करता है, जिसमें से अधिकांश हिस्सा इसी रास्ते से आता है। इन जहाजों के सुरक्षित निकलने से घरेलू बाजार में रसोई गैस की कमी की आशंकाएं कम हुई हैं।


  • शिवालिक और नंदा देवी नामक दो भारतीय जहाजों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित पार कर लिया है।
  • दोनों जहाज लगभग 92,700 मीट्रिक टन LPG लेकर भारत आ रहे हैं, जो देश में रसोई गैस की आपूर्ति बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
  • ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव के कारण यह समुद्री रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए लगभग बंद था, लेकिन भारत की कूटनीतिक बातचीत के बाद इन्हें विशेष अनुमति मिली है।

जब दुनिया की बड़ी शक्तियां पश्चिम एशिया के तनाव में उलझी थीं, तब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ से वो कर दिखाया जो नामुमकिन लग रहा था। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ युद्ध के बाद जहाजों का निकलना सुसाइड मिशन माना जा रहा था, वहाँ से भारतीय जहाजों ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ का सुरक्षित निकलना जयशंकर की कूटनीतिक जीत है।

मुख्य भूमिका और रणनीतिक कदम :

1. तेहरान के साथ सीधा संवाद
सूत्रों के अनुसार, जब ये जहाज फंसे हुए थे, तब जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष के साथ कई बार टेलीफोन पर बातचीत की। उन्होंने भारत और ईरान के ऐतिहासिक संबंधों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि ये जहाज विशुद्ध रूप से नागरिक और मानवीय आपूर्ति (LPG) से जुड़े हैं, जिनका क्षेत्र के सैन्य संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं है।

2. कूटनीति में ‘बैलेंसिंग एक्ट’:
जयशंकर की सबसे बड़ी चुनौती ईरान और अमेरिका/इजरायल के बीच संतुलन बनाना था। एक तरफ उन्होंने ईरान को जहाजों के सुरक्षित मार्ग (Safe Passage) के लिए मनाया, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश दिया कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है। उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि ईरान ने इन जहाजों को ‘विशेष छूट’ दी।

3. नौसेना के साथ तालमेल :
विदेश मंत्रालय (MEA) और रक्षा मंत्रालय के बीच जयशंकर ने एक सेतु का काम किया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि भारतीय नौसेना का ‘ऑपरेशन संकल्प’ केवल जहाजों की सुरक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भारत की संप्रभुता का भी प्रदर्शन करे।

4. वैश्विक मंच पर कड़ा रुख:
जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को बाधित नहीं होने देगा। उनकी ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति ने ही ईरान को इस बात के लिए राजी किया कि भारतीय ध्वज वाले जहाजों को निशाना बनाना रणनीतिक रूप से उनके लिए भी घाटे का सौदा होगा।

विशेषज्ञों की राय:
भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जयशंकर ने इस मामले में ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ (रणनीतिक स्वायत्तता) का परिचय दिया। जहाँ अन्य देश अपने जहाजों को लंबे और महंगे रास्तों (अफ्रीका के चक्कर लगाकर) से भेज रहे थे, जयशंकर की कूटनीति ने भारत का समय और पैसा दोनों बचाया।


निष्कर्ष
यह घटना साबित करती है कि आज के दौर में युद्ध के मैदान से ज्यादा बड़ी जीत कूटनीति की मेज पर हासिल की जा सकती है। एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारत ने दिखा दिया है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने हितों की रक्षा कैसे की जाती है।


“होर्मुज की इन लहरों से भारतीय जहाजों का सुरक्षित निकलना सिर्फ एक सफर नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते रसूख की कहानी है। जयशंकर की कूटनीति और नौसेना के पराक्रम ने एक बार फिर साबित किया कि भारत अपने हितों की रक्षा करना बखूबी जानता है। देखते रहिए, सावधान नेशन न्यूज

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