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सावधान नेशन न्यूज़

घटिया दवाइयां बनाने वालों पर सरकार का बड़ा शिकंजा, गुणवत्ता जांच में फेल होने पर तुरंत निलंबित हो सकता है लाइसेंस

सावधान नेशन न्यूज़

नई दिल्ली, 5 नवंबर 2026

देश में दवाइयों की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ऐसी दवाइयों के निर्माण पर सख्ती करने के लिए नए नियमों का प्रस्ताव रखा है, जो सरकारी जांच में निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं। प्रस्ताव के अनुसार, यदि किसी दवा के नमूने में गंभीर गुणवत्ता संबंधी कमी पाई जाती है, तो संबंधित दवा के निर्माण का लाइसेंस तत्काल निलंबित किया जा सकेगा। सरकार की इस पहल का मुख्य उद्देश्य बाजार में घटिया और असुरक्षित दवाइयों की आपूर्ति रोकना और मरीजों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है।


स्वास्थ्य मंत्रालय ने 4 नवंबर 2026 को इस संबंध में जानकारी साझा की। मंत्रालय ने Drugs Rules, 1945 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत सरकारी प्रयोगशाला में दवा की जांच के दौरान कुछ महत्वपूर्ण मानकों में गड़बड़ी मिलने पर संबंधित दवा के निर्माण का लाइसेंस तुरंत निलंबित करने का प्रावधान शामिल किया गया है।


किन कमियों पर हो सकती है कार्रवाई?
सरकार के प्रस्ताव में दवाइयों की गुणवत्ता से जुड़े पांच महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है। इनमें सक्रिय दवा तत्वों की निर्धारित मात्रा, दवा का शरीर में घुलने की प्रक्रिया, संबंधित अशुद्धियां, अन्य हानिकारक तत्व और स्टेरिलिटी यानी दवा का सूक्ष्मजीवों से मुक्त होना शामिल हैं।
इनमें से किसी भी महत्वपूर्ण मानक में सरकारी जांच के दौरान गंभीर कमी मिलने पर संबंधित दवा के निर्माण का लाइसेंस निलंबित किया जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी दवा में सक्रिय तत्व की मात्रा निर्धारित मानक से कम या अधिक पाई जाती है, तो उसकी प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है। इसी तरह, दवा के सही तरीके से न घुलने या उसमें हानिकारक अशुद्धियां मिलने से मरीजों को नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है। इंजेक्शन और अन्य स्टेराइल दवाइयों में संक्रमण का खतरा भी गंभीर स्वास्थ्य समस्या पैदा कर सकता है।


पहले की व्यवस्था में क्या बदलाव होगा?
मौजूदा व्यवस्था के तहत किसी दवा को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरने वाला घोषित किए जाने के बाद लाइसेंस निलंबित या रद्द करने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें संबंधित निर्माता को कारण बताओ नोटिस जारी करना भी शामिल है।
इस प्रक्रिया में समय लग सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इस दौरान संबंधित दवा बाजार में उपलब्ध रह सकती है, जिससे मरीजों की सुरक्षा प्रभावित होने और खराब दवाइयों को बाजार से वापस मंगाने में परेशानी होने की आशंका रहती है।
नए प्रस्ताव का उद्देश्य इसी देरी को कम करना है, ताकि सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट मिलने के बाद संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण तुरंत कार्रवाई कर सके।


गलती सुधारने के बाद ही वापस मिल सकेगा लाइसेंस
सरकार के प्रस्ताव में केवल लाइसेंस निलंबित करने की बात ही नहीं है, बल्कि दवा निर्माता कंपनियों की जवाबदेही भी तय करने की व्यवस्था रखी गई है।
यदि किसी दवा की गुणवत्ता में कमी पाई जाती है, तो निर्माता कंपनी को सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि आखिर दवा में गड़बड़ी किस कारण से हुई। इसके लिए कंपनी को Root Cause Analysis यानी समस्या के मूल कारण की जांच करनी होगी।
इसके बाद कंपनी को Corrective and Preventive Action (CAPA) के तहत सुधारात्मक और भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके लिए जरूरी कदम उठाने होंगे।
लाइसेंसिंग प्राधिकरण इन सुधारों की जांच और पुष्टि करेगा। जब तक संबंधित प्राधिकरण को यह भरोसा नहीं हो जाता कि कंपनी ने जरूरी सुधार कर लिए हैं, तब तक निलंबन जारी रह सकता है। यानी केवल गलती स्वीकार कर लेने से कंपनी को दोबारा दवा बनाने की अनुमति नहीं मिलेगी।


दवा जांच रिपोर्ट को लेकर भी बढ़ेगी जवाबदेही
प्रस्ताव में सरकारी विश्लेषक की जांच रिपोर्ट साझा करने की व्यवस्था को भी मजबूत करने की बात कही गई है। इसके तहत संबंधित रिपोर्ट ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI), संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के औषधि लाइसेंसिंग प्राधिकरण और संबंधित दवा निर्माता तथा मार्केटर तक पहुंचाई जाएगी।
इससे अलग-अलग नियामक संस्थाओं के बीच जानकारी साझा करने और समय पर कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।


क्यों जरूरी है यह कदम?
भारत दुनिया के प्रमुख दवा उत्पादक देशों में शामिल है। यहां बनने वाली दवाइयों की आपूर्ति देश के साथ-साथ कई दूसरे देशों में भी होती है। ऐसे में दवाइयों की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद जरूरी है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में बनी कुछ दूषित कफ सिरप को लेकर देश और विदेश में गंभीर सवाल उठे हैं। गाम्बिया और उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौत के मामलों में भारतीय निर्मित कफ सिरप की जांच और गुणवत्ता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता सामने आई थी। ऐसे मामलों ने दवा निर्माण और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में उपलब्ध सभी दवाइयां खराब हैं। सरकार का प्रस्ताव उन दवाइयों और निर्माताओं पर कार्रवाई से संबंधित है, जिनकी दवाएं निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं।


अभी लागू नहीं हुए हैं नए नियम
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने फिलहाल इन बदलावों को प्रस्ताव के रूप में रखा है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने संबंधित पक्षों और आम लोगों से 30 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं। सार्वजनिक सुझावों पर विचार करने के बाद नियमों को अंतिम रूप दिया जाएगा। प्रस्तावित संशोधन अंतिम रूप से राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद ही लागू होंगे।


कुल मिलाकर, सरकार की यह पहल दवाइयों की गुणवत्ता पर निगरानी बढ़ाने और मरीजों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि यह प्रस्ताव अंतिम रूप से लागू होता है, तो गुणवत्ता जांच में गंभीर रूप से विफल रहने वाली दवाइयों के निर्माण पर पहले की तुलना में तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी।

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