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जयपुर में लोग बिना AC कैसे कम कर रहे हैं घर का तापमान? पारंपरिक तरीकों और ग्रीन रूफ का बढ़ता चलन

राजस्थान की राजधानी Jaipur इन दिनों भीषण गर्मी और हीटवेव की चपेट में है। मई-जून के महीनों में यहां तापमान कई बार 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाता है। ऐसे में एयर कंडीशनर और कूलर पर निर्भरता तेजी से बढ़ती है, लेकिन बढ़ते बिजली बिल और पर्यावरण को होने वाले नुकसान ने लोगों को नए विकल्प खोजने पर मजबूर कर दिया है। अब जयपुर के हजारों परिवार ऐसे तरीके अपना रहे हैं जिनकी मदद से घर का तापमान प्राकृतिक रूप से कम किया जा रहा है।

हाल के महीनों में जयपुर में “ग्रीन रूफ” यानी छतों पर बागवानी का चलन तेजी से बढ़ा है। लोग अपनी छतों पर घास, पौधे, सब्जियां और छोटे-छोटे पेड़ लगा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सीमेंट की खुली छत दिनभर सूरज की गर्मी सोखती है और रात तक उसे छोड़ती रहती है, जिससे घर अंदर से भट्टी की तरह गर्म हो जाता है। लेकिन जब उसी छत पर पौधे लगाए जाते हैं तो मिट्टी और हरियाली गर्मी को काफी हद तक रोक लेते हैं। इससे घर के अंदर का तापमान कई डिग्री तक कम महसूस होता है।

जयपुर के कई इलाकों में रहने वाले लोगों ने बताया कि पहले दोपहर के समय उनके घरों में पंखे भी गर्म हवा देते थे, लेकिन अब छतों पर पौधे लगाने और पानी का नियमित छिड़काव करने से कमरों में ठंडक बनी रहती है। कुछ परिवारों ने अपनी छतों को पूरी तरह किचन गार्डन में बदल दिया है। इससे न सिर्फ गर्मी कम हो रही है बल्कि घर में ताजी सब्जियां भी मिल रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीन रूफ सिर्फ तापमान कम करने का तरीका नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है। इससे शहर में बढ़ता “हीट आइलैंड इफेक्ट” कम होता है। बड़े शहरों में कंक्रीट और डामर की वजह से आसपास का तापमान सामान्य इलाकों की तुलना में ज्यादा हो जाता है। पेड़-पौधे इस प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं। जयपुर में लोग सिर्फ आधुनिक उपायों पर ही नहीं बल्कि पुराने राजस्थानी तरीकों पर भी भरोसा कर रहे हैं। राजस्थान की पारंपरिक वास्तुकला सदियों से गर्म मौसम को ध्यान में रखकर बनाई जाती रही है। पुराने घरों में मोटी दीवारें, ऊंची छतें, जालीदार खिड़कियां और आंगन बनाए जाते थे ताकि हवा का प्रवाह बना रहे और गर्मी कम लगे।

अब लोग फिर से उन्हीं तरीकों को अपनाने लगे हैं। कई घरों में खस की टट्टियां लगाई जा रही हैं। खस की जड़ों से बनी इन टट्टियों पर पानी डाला जाता है और जब हवा इनके बीच से गुजरती है तो ठंडी होकर कमरे में आती है। यह तरीका पुराने समय में राजस्थान के महलों और हवेलियों में इस्तेमाल होता था।

इसके अलावा कई लोग अपनी छतों पर सफेद चूने की परत करवा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, सफेद रंग सूरज की किरणों को ज्यादा परावर्तित करता है और गर्मी कम सोखता है। इससे छत का तापमान कम रहता है और घर के अंदर भी कम गर्मी महसूस होती है। कुछ इलाकों में लोग मिट्टी की टाइल्स और बांस की चटाइयों का इस्तेमाल भी कर रहे हैं।
जयपुर के वास्तु विशेषज्ञों का कहना है कि अगर घर में सही वेंटिलेशन हो तो AC की जरूरत काफी कम हो सकती है। इसलिए लोग अब सुबह और शाम के समय खिड़कियां खोलकर क्रॉस-वेंटिलेशन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे घर की गर्म हवा बाहर निकल जाती है और ठंडी हवा अंदर आती है।

गर्मी से राहत पाने के लिए कई परिवार दिन के समय मोटे पर्दे और बांस की चिक का उपयोग कर रहे हैं ताकि सीधी धूप कमरे में न आए। कुछ लोग छतों पर पानी का छिड़काव भी करते हैं, जिससे सीमेंट ठंडा रहता है। मिट्टी के घड़े और सुराही का इस्तेमाल भी फिर बढ़ने लगा है क्योंकि इनमें रखा पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है।विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण राजस्थान समेत भारत के कई हिस्सों में गर्मी और बढ़ सकती है। ऐसे में सिर्फ AC पर निर्भर रहना लंबे समय में मुश्किल हो सकता है। AC से बिजली की खपत बढ़ती है और गर्म हवा बाहर निकलने से शहर का तापमान और बढ़ता है। इसलिए प्राकृतिक और पारंपरिक कूलिंग सिस्टम भविष्य के लिए ज्यादा टिकाऊ विकल्प माने जा रहे हैं।

जयपुर नगर निगम और कुछ सामाजिक संस्थाएं भी लोगों को ग्रीन रूफ और पर्यावरण अनुकूल तरीकों के लिए जागरूक कर रही हैं। कई जगहों पर लोगों को मुफ्त पौधे बांटे जा रहे हैं और छतों पर बागवानी के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

आज जयपुर में बदलती सोच साफ दिखाई दे रही है। जहां पहले लोग गर्मी से बचने के लिए सिर्फ महंगे उपकरणों पर निर्भर थे, वहीं अब वे प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान की ओर लौट रहे हैं। छतों पर उगते पौधे, खस की ठंडी खुशबू, सफेद छतें और खुली हवा वाले घर इस बात का संकेत हैं कि आधुनिक समस्याओं का समाधान कई बार पुराने तरीकों में भी छिपा होता है। जयपुर के लोगों का यह प्रयास न केवल उनके घरों को ठंडा कर रहा है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

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