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सावधान नेशन न्यूज़

केरल में SMA पीड़ित बच्चों की दवा पर विवाद, ‘क्लिनिकल ट्रायल’ के लेबल से मचा हड़कंप; सरकार ने शुरू की वापसी की प्रक्रिया

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मामला केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम स्थित श्री अविट्टम तिरुनल (SAT) अस्पताल से जुड़ा है। यहां SMA से पीड़ित बच्चों को पहले स्विस कंपनी रोश की दवा एव्रीस्डी (Evrysdi) दी जा रही थी। अब इसकी जगह भारतीय कंपनी नैटको फार्मा की कम कीमत वाली जेनेरिक दवा नैटस्मार्ट (Natsmart) देने का फैसला किया गया।
विवाद तब सामने आया जब अस्पताल से दवा लेने पहुंचे कुछ बच्चों के परिजनों ने पैकेट पर ‘Physician Sample’ और ‘For Clinical Trials Only’ लिखा देखा। 21 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी दवा छह बच्चों के परिवारों को दी गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी दवा का स्टॉक अगले दिन पहुंचने पर संबंधित परिवारों को बुलाया गया और उन्हें नई सरकारी आपूर्ति वाली दवा दी गई।

SMA बीमारी क्या है?
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाएं प्रभावित होती हैं। इसके कारण मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और बैठने, चलने, निगलने या सांस लेने में परेशानी हो सकती है। गंभीर मामलों में यह बीमारी जानलेवा भी हो सकती है।

रिस्डिप्लाम (Risdiplam) इस बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा है। यह शरीर में जरूरी SMN प्रोटीन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद करती है। इससे बीमारी की प्रगति धीमी हो सकती है, लेकिन यह बीमारी का पूर्ण इलाज नहीं है।

दवा की कीमत में कितना अंतर है?
पुरानी दवा: एव्रीस्डी
लगभग ₹5–6 लाख प्रति बोतल
रिपोर्टों में बताई गई कीमत।
नई दवा: नैटस्मार्ट
लगभग ₹11,000–₹16,000 प्रति बोतल
वास्तविक कीमत और सरकारी खरीद दर अलग हो सकती है।

रिपोर्टों के मुताबिक, नई दवा की कीमत पुरानी दवा के मुकाबले बहुत कम है। इससे सरकार के लिए अधिक बच्चों तक इलाज पहुंचाना आसान हो सकता है। हालांकि, कीमत में भारी अंतर अपने आप यह साबित नहीं करता कि दोनों दवाएं हर मरीज में बिल्कुल एक जैसा परिणाम देंगी। इसके लिए नियामकीय मंजूरी और संबंधित वैज्ञानिक प्रमाण महत्वपूर्ण हैं।

विपक्ष ने क्या सवाल उठाए?
केरल में विपक्ष के नेता पिनराई विजयन ने इस मामले की जांच की मांग की। उनका सवाल है कि अगर दवा के पैकेट पर क्लिनिकल ट्रायल का उल्लेख था, तो उसे बच्चों को देने से पहले अभिभावकों को पूरी जानकारी और उनकी सूचित सहमति क्यों नहीं ली गई।
पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा ने भी बच्चों को ऐसी लेबल वाली दवा दिए जाने पर चिंता जताई। उनका कहना है कि गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चों के इलाज में केवल कम कीमत को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।

सरकार और अस्पताल का क्या कहना है?
स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन और अस्पताल प्रशासन ने नई जेनेरिक दवा का बचाव किया है। उनके अनुसार, नैटको की दवा को नियामकीय मंजूरी प्राप्त है और इसे विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि विवादित लेबल वाली बोतलें नियमित सरकारी दवा की आपूर्ति में देरी के कारण इस्तेमाल की गई थीं। दूसरी ओर, अभिभावक यह स्पष्ट आश्वासन चाहते हैं कि नई दवा उनके बच्चों के लिए सुरक्षित और प्रभावी है।

क्या बच्चों पर सचमुच दवा का परीक्षण किया गया?
अब तक उपलब्ध रिपोर्टों से यह साबित नहीं होता कि बच्चों पर अवैध क्लिनिकल ट्रायल किया गया था। बोतल पर लगा लेबल गंभीर सवाल जरूर खड़े करता है, लेकिन उससे अकेले यह साबित नहीं होता कि बच्चों को दी गई दवा प्रयोगात्मक या बिना मंजूरी वाली थी।
इसी तरह, प्रशासन का बयान भी इस बात की जगह नहीं ले सकता कि संबंधित सैंपल की आपूर्ति, लेबलिंग और अभिभावकों को दी गई जानकारी की पूरी जांच हो। इन पहलुओं पर पारदर्शी जवाब जरूरी है।

निष्कर्ष: विवादित लेबल वाली दवाओं को लेकर सवाल उठे और अस्पताल ने वापसी/बदलाव की प्रक्रिया शुरू की। लेकिन बच्चों पर अवैध परीक्षण किए जाने का आरोप उपलब्ध जानकारी से अंतिम रूप से सिद्ध नहीं हुआ है। मामले की सच्चाई स्पष्ट करने के लिए आपूर्ति प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण है।

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