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Tata Sons की चेयरमैनशिप पर फिर छिड़ा विवाद: आखिर क्यों आमने-सामने आए N. चंद्रशेखरन और Tata Trusts? जानिए पूरी कहानी

सावधान नेशन न्यूज़

नई दिल्ली, 21 सितंबर 2026

Tata Sons में ऐसा क्या हुआ कि चेयरमैन की कुर्सी पर विवाद खड़ा हो गया?
टाटा समूह की कंपनियों को लेकर अक्सर निवेश, कारोबार और विस्तार की खबरें आती रहती हैं, लेकिन सितंबर 2026 में मामला समूह की सबसे महत्वपूर्ण कंपनी Tata Sons की चेयरमैनशिप और उसके शासन-तंत्र तक पहुंच गया है।
विवाद के केंद्र में दो नाम हैं—Tata Sons के Executive Chairman N. Chandrasekaran और Tata Trusts के Chairman Noel Tata।
17 सितंबर 2026 को Tata Sons के बोर्ड ने N. Chandrasekaran को उनका मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद एक और पांच साल के लिए Executive Chairman नियुक्त करने का फैसला किया। लेकिन Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। इसके बाद विवाद केवल यह नहीं रह गया कि चंद्रशेखरन चेयरमैन बने रहेंगे या नहीं, बल्कि यह सवाल भी सामने आ गया कि Tata Sons के Articles of Association यानी कंपनी के आंतरिक नियमों के मुताबिक यह फैसला वैध तरीके से हुआ या नहीं।

यहीं से पूरा मामला बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।


विवाद कब शुरू हुआ?
अगर मौजूदा विवाद की बात करें तो इसकी पृष्ठभूमि 2026 की शुरुआत में तैयार होने लगी थी।
24 फरवरी 2026 की Tata Sons बोर्ड बैठक में N. Chandrasekaran के अगले कार्यकाल पर चर्चा हुई थी। उस समय Noel Tata ने समूह की कुछ कंपनियों के प्रदर्शन, खासकर नई और तेजी से बढ़ाई जा रही कारोबारी इकाइयों को लेकर सवाल उठाए। चंद्रशेखरन के पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव पर तत्काल सहमति नहीं बन सकी और मामला आगे की चर्चा के लिए टल गया।
इसके बाद 26 मई की विशेष बोर्ड बैठक में समूह के कुछ प्रमुख कारोबारों—जैसे Air India, Tata Electronics और Tata Digital—की स्थिति और भविष्य की रणनीति पर चर्चा हुई। रिपोर्टों के अनुसार Noel Tata ने समूह की रणनीति, पूंजी के इस्तेमाल और कुछ कारोबारों के प्रदर्शन को लेकर अधिक स्पष्टता की मांग की।
लेकिन असली मोड़ 12 अगस्त 2026 को आया।
उस दिन Chandrasekaran ने बोर्ड को बताया कि वह अपने मौजूदा कार्यकाल, जो 20 फरवरी 2027 को समाप्त होना है, के बाद खुद को दोबारा नियुक्ति के लिए पेश नहीं करेंगे। Tata Trusts ने बाद में कहा कि यह फैसला स्पष्ट रूप से और स्वतंत्र रूप से लिया गया था और Trusts ने इसे स्वीकार कर लिया था।

फिर सितंबर में घटनाक्रम अचानक बदल गया।


फिर चंद्रशेखरन की वापसी का रास्ता कैसे खुला?
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में Tata Sons ने Chandrasekaran को अगले पांच साल के लिए फिर से Executive Chairman बनाने का प्रस्ताव मंजूर कर दिया।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बोर्ड में Noel Tata और Venu Srinivasan, दोनों Tata Trusts के nominee directors हैं।
इस प्रस्ताव पर दोनों की राय अलग रही।
Noel Tata ने विरोध किया।
Venu Srinivasan ने समर्थन किया।
अन्य निदेशकों के समर्थन से प्रस्ताव बोर्ड में पारित हो गया।
बैठक की अध्यक्षता कर रहे independent director Harish Manwani ने बराबरी की स्थिति में casting vote का इस्तेमाल किया।
Tata Sons का पक्ष है कि बोर्ड की प्रक्रिया के अनुसार casting vote का इस्तेमाल किया जा सकता था। दूसरी तरफ Tata Trusts का कहना है कि सिर्फ सामान्य बोर्ड वोट से यह विशेष आवश्यकता खत्म नहीं हो जाती।

यही वर्तमान विवाद का कानूनी केंद्र है।


Tata Trusts को आपत्ति किस बात पर है?
Tata Sons के शेयरों में Tata Trusts की हिस्सेदारी करीब 66 प्रतिशत है। इसलिए Trusts समूह की holding company में सबसे महत्वपूर्ण shareholder हैं।

Tata Sons के Articles of Association में Trust-nominated directors को कुछ विशेष voting rights दिए गए हैं।
Tata Trusts का कहना है कि Article 121 के तहत जिन मामलों में बोर्ड के बहुमत की जरूरत होती है, वहां Trusts द्वारा nominated directors के बहुमत की affirmative vote भी जरूरी है।
वर्तमान बोर्ड में Trusts के दो nominee directors हैं—Noel Tata और Venu Srinivasan।
जब एक ने समर्थन और दूसरे ने विरोध किया, तो Trusts का तर्क है कि आवश्यक affirmative support पूरा नहीं हुआ।
Trusts ने इसलिए कहा है कि chairman का casting vote Trust nominees के बीच इस विशेष requirement को पूरा नहीं कर सकता। उसके अनुसार 17 सितंबर का resolution “legal effect” नहीं रखता।

हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना बेहद महत्वपूर्ण है—यह Tata Trusts की कानूनी स्थिति है, अदालत का अंतिम फैसला नहीं।
दूसरी ओर Tata Sons का पक्ष है कि बोर्ड में बराबरी की स्थिति में chairman का casting vote लागू होता है और इसी आधार पर प्रस्ताव को पारित माना गया। इसलिए वर्तमान स्थिति में यह कहना कि Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति निश्चित रूप से अवैध है, कानूनी रूप से अंतिम निष्कर्ष नहीं होगा।

विवाद सिर्फ चेयरमैन की कुर्सी तक सीमित नहीं है
इस पूरे मामले में दूसरा बड़ा मुद्दा है—Tata Sons की संभावित listing यानी IPO।
Tata Sons को RBI ने Upper Layer NBFC के रूप में वर्गीकृत किया है। RBI के नियमों के मुताबिक Upper Layer में आने वाली NBFCs पर अतिरिक्त नियामकीय आवश्यकताएं लागू होती हैं, जिनमें listing से जुड़ी शर्त भी शामिल है। RBI की 2024-25 की सूची में Tata Sons को Upper Layer में रखा गया था।

Tata Sons ने निजी और unlisted रहने के लिए नियामकीय राहत पाने की कोशिश की थी। 2026 में RBI की स्थिति के बाद कंपनी के सामने listing से जुड़ा सवाल फिर महत्वपूर्ण हो गया।
17 सितंबर की बैठक में बोर्ड ने लागू RBI नियमों का पालन करने के लिए listing की दिशा में कदम उठाने का फैसला किया। लेकिन Noel Tata ने इस रुख का समर्थन नहीं किया।

इसलिए अब दो बड़े प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ गए हैं—
पहला: Tata Sons का अगला चेयरमैन कौन होगा?
दूसरा: Tata Sons भविष्य में unlisted रहेगी या उसे listed company बनना पड़ेगा?
लेकिन Tata Sons में ऐसा विवाद पहली बार नहीं हुआ
मौजूदा विवाद को समझने के लिए 2016 की घटना को समझना बहुत जरूरी है।
साल 2012 में Cyrus Mistry ने Ratan Tata के बाद Tata Sons के Executive Chairman का पद संभाला था। लेकिन 24 अक्टूबर 2016 को Tata Sons के बोर्ड ने अचानक Mistry को चेयरमैन पद से हटा दिया और Ratan Tata को अंतरिम चेयरमैन बनाया गया।

इसके बाद Mistry और Tata Group के बीच लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।
Mistry पक्ष ने Tata Sons और Tata Trusts पर corporate governance तथा oppression और mismanagement से जुड़े आरोप लगाए। विवाद में Corus acquisition, Nano project, Tata Teleservices, Siva/Sterling से जुड़े लेन-देन और अन्य कारोबारी फैसले जैसे मुद्दे उठे। सुप्रीम कोर्ट के 2021 के फैसले में इन आरोपों और निचली न्यायिक संस्थाओं में हुई सुनवाई का विस्तार से उल्लेख है।

2018 में NCLT ने Mistry की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद NCLAT ने दिसंबर 2019 में NCLT के फैसले को पलटते हुए Mistry की बहाली का आदेश दिया।


मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
26 मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने Tata Sons की अपील स्वीकार करते हुए NCLAT के फैसले को पलट दिया। अदालत ने Mistry की बहाली से संबंधित NCLAT के आदेश को कायम नहीं रखा।

इस पुराने विवाद का महत्व आज इसलिए है क्योंकि उसी मामले में Tata Sons के Articles of Association और Tata Trusts के nominee directors के विशेष voting rights की भी चर्चा हुई थी।


2016 और 2026 के विवाद में क्या अंतर है?
दोनों मामलों में Tata Sons की चेयरमैनशिप और Tata Trusts की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन परिस्थितियां अलग हैं।
2016 में विवाद मुख्य रूप से Cyrus Mistry को हटाने और उसके बाद corporate governance तथा management decisions को लेकर शुरू हुआ था।
2026 में विवाद की शुरुआत Chandrasekaran के अगले कार्यकाल पर सहमति न बनने से हुई और बाद में यह बढ़कर Articles of Association, Trust nominees के voting rights, casting vote और Tata Sons की listing जैसे सवालों तक पहुंच गया है।
इसलिए दोनों घटनाओं को बिल्कुल एक जैसा कहना सही नहीं होगा।


अब आगे क्या होगा?
मामला अभी समाप्त नहीं हुआ है।
Tata Trusts ने 17 सितंबर के निर्णय की वैधता पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है। Trusts का कहना है कि Articles of Association में दी गई विशेष voting व्यवस्था का पालन नहीं हुआ। दूसरी तरफ Tata Sons का बोर्ड अपने निर्णय और casting vote की वैधता के पक्ष में है।

इसके अलावा Tata Sons के Annual General Meeting और निदेशक के रूप में Chandrasekaran की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि chairman के रूप में बने रहने के लिए कंपनी की आगे की औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होना जरूरी हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा विवाद का अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। इसलिए फिलहाल “कौन सही है” या “कौन गलत है” कहना जल्दबाजी होगी।


निष्कर्ष
Tata Sons का मौजूदा विवाद सिर्फ एक व्यक्ति की चेयरमैनशिप का मामला नहीं है। इसके पीछे तीन बड़े सवाल हैं—कंपनी की नेतृत्व व्यवस्था, Tata Trusts के विशेष अधिकार और Tata Sons के भविष्य का कारोबारी ढांचा।
एक तरफ Tata Sons का बोर्ड Chandrasekaran को अगले पांच साल के लिए जारी रखना चाहता है और RBI के नियमों के अनुरूप आगे बढ़ने की बात कर रहा है। दूसरी तरफ Tata Trusts, जिसकी Tata Sons में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया और कंपनी की listing को लेकर अलग रुख रखता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 17 सितंबर का फैसला हो चुका है, लेकिन उसकी वैधानिकता को लेकर विवाद अभी खुला हुआ है। इसका समाधान Tata Sons के Articles of Association की व्याख्या, कंपनी की आगे की shareholder प्रक्रिया और जरूरत पड़ने पर कानूनी मंचों पर तय हो सकता है।
यानी 2016 में शुरू हुई Tata Sons की governance से जुड़ी पुरानी कहानी ने 2026 में एक नया अध्याय जरूर खोल दिया है—लेकिन इस बार लड़ाई का केंद्र Cyrus Mistry नहीं, बल्कि N. Chandrasekaran की अगली पांच साल की पारी और Tata Trusts के विशेष अधिकार हैं।

सावधान नेशन न्यूज़…

6 thoughts on “Tata Sons की चेयरमैनशिप पर फिर छिड़ा विवाद: आखिर क्यों आमने-सामने आए N. चंद्रशेखरन और Tata Trusts? जानिए पूरी कहानी”

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