सावधान नेशन न्यूज़

आयुर्वेद के अनुसार खाएं ये फल, वसंत ऋतु में बनी रहेगी सेहत और ताजगी

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तरुण कश्यप

नमस्कार, आज हम बात करेंगे मार्च के महीने में आपके खान-पान की। आयुर्वेद में ‘ऋतुचर्या’ यानी मौसम के अनुसार जीवनशैली का बड़ा महत्व है। मार्च में जब सर्दियां विदा ले रही होती हैं और गर्मी दस्तक देती है, तब हमारे शरीर में ‘कफ दोष’ बढ़ने लगता है। ऐसे में सही फलों का चुनाव आपको मौसमी बीमारियों से बचा सकता है।

नमस्कार, आज हम बात करेंगे मार्च के महीने में आपके खान-पान की। आयुर्वेद में ‘ऋतुचर्या’ यानी मौसम के अनुसार जीवनशैली का बड़ा महत्व है। मार्च में जब सर्दियां विदा ले रही होती हैं और गर्मी दस्तक देती है, तब हमारे शरीर में ‘कफ दोष’ बढ़ने लगता है। ऐसे में सही फलों का चुनाव आपको मौसमी बीमारियों से बचा सकता है।


मार्च में खाए जाने वाले मुख्य फल

  • अंगूर (Grapes): मार्च में काले और हरे अंगूर भरपूर मात्रा में मिलते हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं और शरीर को हाइड्रेटेड रखते हैं।
  • अनार (Pomegranate): आयुर्वेद में अनार को ‘त्रिदोषशामक’ माना गया है। यह पाचन में सुधार करता है और शरीर की गर्मी को शांत करता है।
  • पपीता (Papaya): पपीता पूरे साल उपलब्ध रहता है और वसंत ऋतु में पाचन अग्नि को बढ़ाने में मदद करता है। यह विटामिन्स का बेहतरीन स्रोत है।
  • आम की शुरुआती किस्में (Early Mangoes): मार्च के अंत तक तोतापुरी और सफेदा जैसी शुरुआती किस्में आने लगती हैं। आयुर्वेद के अनुसार ताजा आम का रस ऊर्जा देता है, लेकिन इन्हें सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए।
  • तरबूज और खरबूजा (Melons): जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, तरबूज और खरबूजा शरीर को शीतलता प्रदान करते हैं।
  • स्ट्रॉबेरी (Strawberries): मार्च के शुरुआती हफ्तों में ताजी स्ट्रॉबेरी मिलती है, जो विटामिन-C और एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत है।

फल खाने के आयुर्वेदिक नियम

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  1. समय का ध्यान: फल खाने का सबसे अच्छा समय सुबह खाली पेट या नाश्ते के दौरान होता है।
  2. मिश्रण से बचें: फलों को कभी भी दूध या दही के साथ नहीं मिलाना चाहिए, क्योंकि यह ‘विरुद्ध आहार’ माना जाता है और पाचन खराब कर सकता है।
  3. सूर्यास्त के बाद परहेज: रात के समय फल खाने से बचना चाहिए, विशेषकर खट्टे फल, क्योंकि ये वात और कफ को बढ़ा सकते हैं।
  4. ताजा और स्थानीय: हमेशा ताजे और स्थानीय स्तर पर उगने वाले मौसमी फल ही चुनें, क्योंकि इनमें ‘प्राण’ (जीवन ऊर्जा) अधिक होती है।

अंगूर की फसल को मुख्य रूप से थ्रिप्स (Thrips)मिलीबग (Mealybug) और डाउनी मिल्ड्यू (Downy Mildew) जैसी बीमारियों से बचाने के लिए निम्नलिखित रसायनों का उपयोग किया जाता है: 

1. कीट नियंत्रण के लिए प्रमुख कीटनाशक (Insecticides) 

  • इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid): यह सबसे लोकप्रिय कीटनाशकों में से एक है। इसका उपयोग थ्रिप्स और चूसने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए किया जाता है।
  • लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन (Lambda-cyhalothrin): ‘कराटे’ (Karate) ब्रांड नाम से प्रसिद्ध यह कीटनाशक थ्रिप्स के लिए प्रभावी है।
  • डाइमेथोएट (Dimethoate): ‘रोगर’ (Rogor) के नाम से मिलने वाला यह रसायन थ्रिप्स और मिलीबग के नियंत्रण में सहायक है।
  • थियामेथोक्सम (Thiamethoxam): यह चूसने वाले कीटों के खिलाफ लंबी सुरक्षा प्रदान करता है।
  • मैलाथियान (Malathion): पत्ती मोड़ने वाले कैटरपिलर और थ्रिप्स के लिए इसका छिड़काव किया जाता है। 

2. रोगों के लिए फफूंदनाशक (Fungicides) 

  • मैन्कोजेब (Mancozeb): इसे ‘M-45’ के नाम से जाना जाता है और यह डाउनी मिल्ड्यू और अन्य फंगल रोगों के लिए एक व्यापक स्पेक्ट्रम सुरक्षा प्रदान करता है।
  • एक्रोबैट (Acrobat): इसमें डिमेथोमोर्फ (Dimethomorph) होता है, जो अंगूर में डाउनी मिल्ड्यू के खिलाफ सबसे भरोसेमंद रसायनों में से एक है।
  • कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (Copper Oxychloride): इसे ‘ब्लू कॉपर’ के नाम से भी जाना जाता है और यह फंगल संक्रमण को रोकने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • हेक्साकोनाजोल (Hexaconazole): यह पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew) को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी सिस्टेमिक फफूंदनाशक है। 

3. जैविक विकल्प (Biopesticides) 

केमिकल अवशेषों (Residues) को कम करने के लिए कई किसान जैविक विकल्पों को अपनाते हैं:

  • नीम आधारित उत्पाद (Azadirachtin): थ्रिप्स के प्रबंधन के लिए 1% या 5% नीम तेल का छिड़काव किया जाता है।
  • बायो-एजेंट्स: ब्यूवेरिया बेसियाना (Beauveria bassiana) और वर्टीसिलियम लेकानी (Verticillium lecanii) का उपयोग मिलीबग और थ्रिप्स के जैविक नियंत्रण के लिए किया जाता है। 

सावधानी

  • धुलाई: अंगूरों पर पेस्टिसाइड के अवशेष हो सकते हैं, इसलिए खाने से पहले इन्हें नमक वाले पानी या बेकिंग सोडा के घोल में भिगोकर अच्छी तरह धोना चाहिए।
  • PHI : फसल काटने से कुछ दिन पहले छिड़काव बंद कर देना चाहिए ताकि फल सुरक्षित रहें।

स्ट्रॉबेरी में पाए जाने वाले मुख्य कीटाणु और बैक्टीरिया 

  • बैक्टीरिया (Bacteria): स्ट्रॉबेरी में साल्मोनेला ई. कोलाई  और लिस्तारिया  जैसे हानिकारक बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। ये दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क से आते हैं।
  • वायरस : इसमें हेपेटाइटिस ए  और नोरोवायरस भी हो सकते हैं, जो अक्सर दूषित सिंचाई या संक्रमित श्रमिकों के माध्यम से फल तक पहुँचते हैं।
  • कीड़े और लार्वा : स्ट्रॉबेरी के अंदर छोटे सफेद कीड़े या मक्खियों के लार्वा (Fruit fly larvae) छिपे हो सकते हैं, जो बाहर से दिखाई नहीं देते।
  • फंगस : नम मौसम में इसमें ग्रे मोल्ड और डाउनी मिल्ड्यू जैसी फफूंद लग सकती है, जिससे फल सड़ने लगते हैं। 

कीटाणुओं से बचने के तरीके

इन कीटाणुओं और कीटनाशकों (Pesticides) को हटाने के लिए केवल सादा पानी पर्याप्त नहीं है। आप निम्नलिखित तरीकों को अपना सकते हैं: 

  1. सिरके के पानी का उपयोग (Vinegar Soak):
    • एक कटोरे में 3 भाग ठंडा पानी और 1 भाग सफेद सिरका (White Vinegar) मिलाएं।
    • स्ट्रॉबेरी को इसमें 5 मिनट के लिए भिगो दें। सिरका बैक्टीरिया को मारने और कीटनाशकों को कम करने में मदद करता है।
    • बाद में ताजे बहते पानी से अच्छी तरह धो लें。
  2. नमक के पानी का घोल (Salt Water Soak):
    • छोटे कीड़ों या लार्वा को बाहर निकालने के लिए 1 कप पानी में 1 चम्मच नमक मिलाएं।
    • स्ट्रॉबेरी को इसमें 5-10 मिनट भिगोएं। इससे कीड़े बाहर निकल आते हैं। इसके बाद साफ पानी से धोना न भूलें।
  3. बेकिंग सोडा
    • एक बड़े बर्तन में पानी भरें और उसमें कुछ चम्मच बेकिंग सोडा घोलें।
    • स्ट्रॉबेरी को कुछ मिनट भिगोने के बाद साफ पानी से धो लें। यह विधि कीटनाशकों के अवशेषों को बेअसर करने में प्रभावी है।
  4. सामान्य सावधानियां:
    • खाने से ठीक पहले धोएं: स्ट्रॉबेरी को पहले से धोकर न रखें, क्योंकि नमी के कारण फंगस या मोल्ड जल्दी लग सकते हैं।
    • हाथों की सफाई: फल को छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को अच्छी तरह धोएं।
    • खराब फल निकाल दें: यदि कोई फल सड़ा हुआ या अत्यधिक नरम दिखे, तो उसे फेंक दें क्योंकि वह अन्य फलों को भी संक्रमित कर सकता है। 

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