कानपुर के रठिगांव में चल रहे एक बड़े साइबर ठगी के नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ है, जिसने जामताड़ा जैसे कुख्यात ठगी केंद्रों को भी पीछे छोड़ दिया है। इस पूरे मामले पर आधारित एक विस्तृत समाचार रिपोर्ट नीचे दी गई है
जामताड़ा को भी मात दे गया कानपुर का ‘रठिगांव’, तमिलनाडु से ट्रेनिंग लेकर गांव में खोली ठगी की ‘पाठशाला‘
कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले का एक छोटा सा गांव ‘रठिगांव’ आज देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। कभी खेती-किसानी के लिए पहचाने जाने वाला यह गांव अब साइबर अपराध के नए गढ़ के रूप में उभरा है। पुलिस ने यहां एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जिसने करीब 100 लोगों की फौज खड़ी कर देश के कई राज्यों में ठगी का जाल बिछा रखा था।
मजदूरी करने गए थे, ठगी सीखकर लौटे
पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल के अनुसार, इस पूरे गिरोह का मास्टरमाइंड शैलेंद्र कुमार है। शैलेंद्र कुछ समय पहले तमिलनाडु के एन्नौर में एक मिल में मजदूरी करने गया था। वहां उसकी मुलाकात कुछ ऐसे शातिरों से हुई जो मजदूरी की आड़ में साइबर ठगी कर रहे थे। कम समय में ज्यादा पैसे कमाने के लालच में शैलेंद्र ने ठगी के गुर सीखे और वापस अपने गांव रेउना के रठिगांव लौट आया।
100 लोगों का नेटवर्क और 10 लाख की रोजाना कमाई
शैलेंद्र ने गांव लौटकर युवाओं से लेकर 55 साल तक के बुजुर्गों को ठगी की ट्रेनिंग दी। गिरोह का काम करने का तरीका किसी कॉर्पोरेट ऑफिस जैसा था
डेली टास्क: हर सदस्य को प्रतिदिन 100 लोगों को कॉल करने का लक्ष्य दिया जाता था।
सफलता दर: हर 100 कॉल में से कम से कम 8 से 10 लोग इनके झांसे में आ जाते थे।
कमाई:इस नेटवर्क के जरिए गिरोह प्रतिदिन लगभग 10 लाख रुपये की ठगी कर रहा था।
कार्यस्थल: पकड़े जाने के डर से ये लोग किसी बंद कमरे के बजाय खेतों, पेड़ों के नीचे और ट्यूबवेल के पास बैठकर अपना काम करते थे।
ठगी के दो प्रमुख तरीके
पुलिस की पूछताछ में ठगों ने अपने काम करने के तरीके (Modus Operandi) का प्रदर्शन भी किया:
1. सरकारी योजनाओं का झांसा: ठग लोगों को ‘आवास विकास’ का अधिकारी बनकर फोन करते थे। प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम पर उनसे आधार कार्ड जैसी जानकारी मांगते और फिर ‘रजिस्ट्रेशन फीस’ के नाम पर पैसे ट्रांसफर करवा लेते थे।
2. डर और धमकी: गिरोह के सदस्य पुलिस अधिकारी बनकर लोगों को अश्लील वीडियो देखने या ऑनलाइन गेमिंग के फर्जी मामलों में फंसाने की धमकी देते थे। डर पैदा करने के लिए ये बैकग्राउंड में पुलिस सायरन की रिकॉर्डिंग भी बजाते थे।
जामताड़ा के ठगों को भी नहीं बख्शा
हैरानी की बात यह है कि इस गिरोह ने झारखंड के जामताड़ा, जो खुद ठगी का केंद्र माना जाता है, वहां के लोगों को भी अपना शिकार बनाया। अब तक की जांच में यूपी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा और कर्नाटक समेत कई राज्यों के 500 से अधिक लोगों से सवा करोड़ रुपये की ठगी की पुष्टि हो चुकी है। पीड़ितों में आम नागरिक से लेकर पुलिस के सिपाही तक शामिल हैं।
पुलिस की अपील
पुलिस आयुक्त ने बताया कि जब एक पीड़ित से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो वह इतना डरा हुआ था कि उसने पुलिस को ही ठग समझकर बात करने से मना कर दिया। प्रशासन ने जनता से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर अपनी निजी जानकारी साझा न करें और न ही किसी सरकारी योजना के नाम पर अज्ञात खातों में पैसे भेजें।
संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट हालिया पुलिस कार्रवाई और घटनाक्रमों पर आधारित है। साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा साधन है।