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चुनावी शंखनाद: बंगाल में हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता के संगम से टीएमसी को चुनौती देगी बीजेपी।

सावधान नेशन न्यूज़ बांग्ला, कोलकाता

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर चुनावी शंखनाद हो चुका है। आगामी विधानसभा चुनावों के पहले चरण के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इस बार बीजेपी केवल सत्ता विरोधी लहर के भरोसे नहीं है, बल्कि उसने एक ऐसी ‘मेगा चुनावी रणनीति’ तैयार की है जो राज्य के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को पूरी तरह से प्रभावित कर सकती है। इस रणनीति का सबसे बड़ा और विवादास्पद केंद्र बिंदु है— समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) का वादा।

UCC: बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक या जोखिम भरा दांव
बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र के केंद्र में UCC को रखकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह बंगाल में वैचारिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को धार देगी। पार्टी का तर्क है कि ‘एक देश, एक कानून’ की अवधारणा को बंगाल में लागू करना महिला सशक्तिकरण और न्याय के लिए जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि UCC का मुद्दा उठाकर बीजेपी सीधे तौर पर ममता बनर्जी के ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ के आरोपों को हवा दे रही है। बीजेपी नेतृत्व का कहना है कि बंगाल में घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव की वजह से UCC की आवश्यकता अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। यह वादा विशेष रूप से उन मतुआ समुदायों और सीमावर्ती क्षेत्रों के हिंदू मतदाताओं को लुभाने के लिए है, जो लंबे समय से नागरिकता और समान अधिकारों की मांग कर रहे हैं।

पहले चरण के लिए ‘घेराबंदी’ की रणनीति
बीजेपी ने पहले चरण के मतदान वाले क्षेत्रों के लिए ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ योजना बनाई है। इसके तहत तीन प्रमुख स्तंभों पर काम किया जा रहा है

   1. बूथ विजय संकल्प: पार्टी ने ‘हर बूथ, बीजेपी मजबूत’ के नारे के साथ जमीनी कार्यकर्ताओं की एक सेना तैयार की है। प्रत्येक बूथ पर 20 सक्रिय कार्यकर्ताओं की टीम तैनात की गई है, जिनका काम घर-घर जाकर केंद्र सरकार की योजनाओं और UCC के फायदों को समझाना है।
   2. हिंदुत्व और स्थानीय पहचान का संगम: बीजेपी इस बार केवल हिंदुत्व की बात नहीं कर रही, बल्कि वह इसे बंगाली अस्मिता (जैसे महाप्रभु चैतन्य, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आदर्शों) के साथ जोड़कर पेश कर रही है।
   3. महिला वोट बैंक पर नजर: ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी तृणमूल कांग्रेस (TMC) की योजनाओं के काट के रूप में बीजेपी UCC को महिलाओं के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा के रूप में प्रचारित कर रही है।

भ्रष्टाचार और घुसपैठ को बनाया बड़ा मुद्दा
बीजेपी की रणनीति का दूसरा बड़ा हिस्सा है—TMC सरकार को घेरना। पार्टी ने ‘संदेशखाली’ और हालिया भर्ती घोटालों को लेकर राज्य सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। बीजेपी के शीर्ष नेताओं का कहना है कि बंगाल में लोकतंत्र नहीं, बल्कि ‘दीदी का तंत्र’ चल रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रैलियों के जरिए बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बंगाल में ‘डबल इंजन’ की सरकार आने पर ही भ्रष्टाचार रुकेगा और सीमा पार से होने वाली अवैध घुसपैठ पर लगाम लगेगी। UCC को इसी घुसपैठ रोकने की कड़ी के तौर पर भी देखा जा रहा है।

TMC की प्रतिक्रिया और चुनौती
बीजेपी के इस ‘UCC कार्ड’ पर ममता बनर्जी और TMC ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे बंगाल की विविध संस्कृति पर हमला करार दिया है। TMC का कहना है कि बीजेपी बंगाल को धार्मिक आधार पर विभाजित करना चाहती है। वहीं, राज्य की मुस्लिम आबादी के बीच UCC को लेकर एक असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है, जिसका फायदा TMC अपने पक्ष में ध्रुवीकरण के रूप में उठाने की कोशिश करेगी।

क्या बंगाल की जनता स्वीकार करेगी UCC?
बंगाल की राजनीति हमेशा से ‘अस्मिता’ और ‘संस्कृति’ के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बीजेपी का UCC का वादा एक तरफ शहरी मध्यम वर्ग को न्यायसंगत लग सकता है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में इसकी जटिलता और धार्मिक संवेदनशीलता पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है।
बीजेपी ने इस बार उत्तर बंगाल और मतुआ बहुल क्षेत्रों में विशेष ध्यान केंद्रित किया है, जहाँ पिछली बार भी उसे अच्छी सफलता मिली थी। अगर पार्टी पहले चरण में अपनी रणनीति के अनुसार बढ़त हासिल कर लेती है, तो यह बाकी चरणों के लिए एक मजबूत मनोवैज्ञानिक लाभ साबित होगा।

बीजेपी का बंगाल प्लान केवल सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राज्य की राजनीतिक दिशा को बदलने की कोशिश कर रही है। UCC का वादा बंगाल की राजनीति में एक ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि 2 मई (या चुनाव परिणाम के दिन) बंगाल की जनता ‘मां, माटी, मानुष’ के साथ खड़ी रहती है या फिर बीजेपी के ‘समान अधिकार और विकास’ के एजेंडे पर मुहर लगाती है।

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