वॉशिंगटन: दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ते तनाव और साल दर साल चले आ रहे टैरिफ वॉर के बीच एक ऐतिहासिक मोड़ आने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस हफ्ते चीन की तीन दिवसीय (13 से 15 मई) आधिकारिक यात्रा पर बीजिंग पहुँच रहे हैं। लगभग एक दशक के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली चीन यात्रा है, जो वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।
इस हाई-प्रोफाइल यात्रा में ट्रंप के साथ बोइंग, सिटीग्रुप और क्वालकॉम जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियों के अधिकारियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है। माना जा रहा है कि इन बड़ी कंपनियों की मौजूदगी का मुख्य उद्देश्य चीनी कंपनियों के साथ बड़े सौदे करना है, ताकि अमेरिका के व्यापार घाटे को कम किया जा सके।
टैरिफ वॉर का इतिहास: टकराव से लेकर ठहराव तक
अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक खींचतान की शुरुआत 2018 में हुई थी, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने 250 अरब डॉलर के चीनी आयात पर टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। ट्रंप का तर्क था कि चीन व्यापार में अमेरिका का अनुचित लाभ उठा रहा है। जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर भारी शुल्क लगा दिए, जिससे एक पूर्ण ट्रेड वॉर छिड़ गया।
हालांकि, साल 2021 में सत्ता परिवर्तन हुआ और जो बाइडन राष्ट्रपति बने, लेकिन चीन के प्रति अमेरिकी रुख में नरमी नहीं आई। बाइडन प्रशासन ने न केवल पुराने टैरिफ बरकरार रखे, बल्कि तकनीकी क्षेत्र में चीन की घेराबंदी और कड़ी कर दी। हुवावे और टिकटॉक जैसे दिग्गजों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए और चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाजे लगभग बंद कर दिए गए।
2025: ट्रंप की वापसी और सख्त नीतियां
2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को और अधिक आक्रामक बना दिया। उन्होंने चीन पर फेंटानिल नामक घातक ड्रग्स की तस्करी का आरोप लगाते हुए चीनी सामानों पर टैरिफ बढ़ाकर 34% तक कर दिया। यह दुनिया के किसी भी देश पर लगाया गया सबसे अधिक शुल्क है। इस फैसले ने चीन के निर्यात क्षेत्र को हिलाकर रख दिया और चीनी गोदाम बिना बिके माल से भर गए।
जवाब में चीन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों को निशाना बनाया, जिससे ट्रंप के मुख्य वोट बैंक—अमेरिकी किसानों—को भारी नुकसान हुआ। हालांकि, चीन के पास भी एक ‘ब्रह्मास्त्र’ था: दुर्लभ धातुओं पर उसका एकाधिकार। स्मार्टफोन से लेकर लड़ाकू विमानों तक में इस्तेमाल होने वाले इन खनिजों की आपूर्ति रुकने के डर ने ट्रंप को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया।
समझौते की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
अक्टूबर में दक्षिण कोरिया में हुई ट्रंप-शी की पिछली मुलाकात ने एक ‘युद्धविराम’ का काम किया था। चीन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद फिर से शुरू करने का वादा किया, जबकि अमेरिका ने फेंटानिल से जुड़े कच्चे माल पर टैरिफ कम किए और सेमीकंडक्टर की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में कुछ ढील दी।
पॉलिसी रिसर्चर निंग लेंग के अनुसार, चीन के लिए यह ट्रेड वॉर एक बड़ा झटका था क्योंकि वह व्यापार के लिए अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर था। लेकिन आज स्थिति थोड़ी अलग है। अर्थशास्त्री तेंग हेइवाई का मानना है कि चीन ने अब नए वैश्विक साझेदार तलाश लिए हैं और उसका निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर है। इसके अलावा, चीन रोबोटिक्स और एडवांस चिप्स के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है।
यात्रा के मुख्य एजेंडे और चुनौतियां
इस यात्रा के दौरान ट्रंप चीन पर सोयाबीन और विमान के पुर्जों जैसे अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने का दबाव डालेंगे। लेकिन ट्रंप के लिए राह इतनी आसान नहीं है। हाल ही में अमेरिकी ट्रेड कोर्ट ने उनके कुछ वैश्विक टैरिफ को ‘अनुचित’ करार दिया है, जिससे उनकी नीतियों को घरेलू मोर्चे पर कानूनी चुनौती मिली है।
इसके अलावा, इस बैठक पर ईरान युद्ध की छाया भी रहेगी। चीन, ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, जबकि अमेरिका की नीतियां इसके विपरीत हैं। हालांकि रूस से तेल आयात के कारण चीन अब तक युद्ध के आर्थिक झटकों से बचा रहा है, लेकिन लंबे समय तक खिंचता संघर्ष उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
क्या यह यात्रा केवल एक व्यापारिक सौदा बनकर रह जाएगी या दोनों देश अपने गहरे मतभेदों को सुलझाने का कोई स्थाई रास्ता निकालेंगे? पूरी दुनिया की नजरें बीजिंग पर टिकी हैं। एक ओर ट्रंप को अपनी मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों को वापस लाने का वादा निभाना है, तो दूसरी ओर राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपनी सुस्त पड़ती घरेलू खपत और संपत्ति संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था को सहारा देना है।
15 मई तक चलने वाली यह वार्ता तय करेगी कि आने वाले दशक में वैश्विक बाजार का नेतृत्व कौन करेगा—प्रतिद्वंद्विता या साझेदारी।
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