भारत एक बार फिर उस दौर की याद दिला रहा है जब देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए नागरिकों से व्यक्तिगत त्याग की अपील की गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से ईंधन बचाने, वर्क फ्रॉम होम’ अपनाने और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने की भावुक अपील की है। यह कदम ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में आए उछाल और भारत के बढ़ते आयात बिल के मद्देनजर उठाया गया है।
प्रधानमंत्री ने नागरिकों से केवल ईंधन ही नहीं, बल्कि एक साल तक गैर-ज़रूरी सोने की खरीद रोकने और विदेश यात्राओं (छुट्टियों और शादियों) से बचने का भी आग्रह किया है।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
प्रधानमंत्री की यह अपील पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के 1965 के उस आह्वान की याद दिलाती है, जब भोजन संकट के दौरान उन्होंने भारतीयों से सोमवार शाम का उपवास रखने को कहा था। उस समय समाजवादी नेता मधु लिमये ने इसे नागरिक कर्तव्य बताया था। इसी तरह, 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान भी भारत का पेट्रोलियम आयात बिल 2 अरब डॉलर से बढ़कर 5.7 अरब डॉलर हो गया था, जिससे देश डिफॉल्टर होने की कगार पर पहुँच गया था।
आज, हालांकि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के करीब है, फिर भी सरकार का यह सतर्क रुख आर्थिक जगत में चिंता पैदा कर रहा है।
रुपया ऐतिहासिक गिरावट पर, तेल का बोझ बढ़ा
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के निदेशक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, भारत का आयात-निर्यात संतुलन अब भी पटरी पर नहीं है।
तेल की कीमतें: फरवरी में जो तेल 78 डॉलर प्रति बैरल था, वह ईरान संकट के बाद 126 डॉलर तक पहुँच गया और फिलहाल 105-110 डॉलर के आसपास है।
आयात बिल: वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का तेल आयात बिल 176 अरब डॉलर तक पहुँच गया है।
रुपये की स्थिति: युद्ध शुरू होने के समय रुपया डॉलर के मुकाबले 91 पर था, जो अब गिरकर 95 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर को पार कर गया है।
संकट के तीन मुख्य कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय तीन तरफा दबाव झेल रही है
1.बढ़ता व्यापार घाटा: ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के भारी आयात के कारण 700 अरब डॉलर का भंडार भी कम पड़ता दिख रहा है।
2. रेमिटेंस पर असर: खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय कामगारों द्वारा भेजे जाने वाले धन पर युद्ध का सीधा असर पड़ा है।
3. विदेशी निवेश की निकासी: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाला है, जिससे शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखी जा रही है।
सरकार की रणनीति और चुनौतियाँ
पश्चिम बंगाल और असम में अपनी पार्टी की चुनावी जीत के तुरंत बाद मोदी की यह अपील दिखाती है कि आर्थिक स्थिति कितनी गंभीर है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूस से सस्ता तेल मिलना कम हुआ है, जिससे भारत को अन्य महंगे विकल्पों की ओर मुड़ना पड़ा है। घरेलू रिफाइनरियों को अब स्थानीय खपत के लिए रसोई गैस उत्पादन को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट का एकमात्र स्थाई समाधान ‘निर्यात बढ़ाना और आयात कम करना’ है। पीएम मोदी की यह अपील विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने की एक कोशिश है। क्या भारतीय नागरिक 1965 की तरह इस बार भी ‘स्वैच्छिक किफायत’ को अपनाएंगे? यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन शेयर बाजार की हलचल और रुपये की गिरावट यह संकेत दे रही है कि आने वाले दिन आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
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