सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 2 नवंबर 2026
बिहार की राजनीति में इन दिनों दो नवनिर्वाचित निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों (MLC) के भारतीय जनता पार्टी (BJP) को समर्थन देने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। तिरहुत स्नातक सीट से जीतने वाले बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित राहुल राज के भाजपा के साथ आने के बाद विपक्ष ने सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इसे संविधान के दल-बदल विरोधी प्रावधानों से जोड़ते हुए दोनों की विधान परिषद सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई है।
इस मामले ने बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की सदस्यता लेने और केवल पार्टी को समर्थन देने के बीच का अंतर सबसे अहम है।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव हुए थे। इन चुनावों में दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। इनमें बंशीधर ब्रजवासी ने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की, जबकि राहुल राज ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार जीत हासिल की।
दोनों उम्मीदवारों ने चुनाव में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के प्रत्याशियों को हराया था। चुनाव परिणाम आने के बाद 31 अक्टूबर को दोनों नेता पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की। इसके बाद भाजपा के साथ उनके जुड़ने की खबर सामने आई।
शुरुआती तस्वीरों और बयानों से दोनों नेताओं के भाजपा की सदस्यता लेने की बात सामने आई। कुछ तस्वीरों में दोनों के हाथों में पार्टी की सदस्यता पर्ची भी दिखाई दी। भाजपा की ओर से भी शुरुआत में दोनों के पार्टी में शामिल होने की जानकारी दी गई। लेकिन विवाद बढ़ने के बाद पार्टी की तरफ से इसे समर्थन देने का मामला बताया जाने लगा।
RJD ने क्यों उठाई सदस्यता रद्द करने की मांग?
इस घटनाक्रम के बाद RJD ने भाजपा और दोनों निर्दलीय MLC पर निशाना साधा। राजद नेताओं का कहना है कि जब कोई उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतकर विधान परिषद पहुंचता है, तो चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता ग्रहण करना संविधान के दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आ सकता है।
RJD के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने दोनों नवनिर्वाचित सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की मांग की। पार्टी का कहना है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जनता से जनादेश लेने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है।
राजद के वरिष्ठ नेता मनोज कुमार झा ने भी इस मामले में विधान परिषद के सभापति से हस्तक्षेप करने की मांग की है। विपक्ष ने संकेत दिया है कि यदि इस मामले में उचित कार्रवाई नहीं हुई तो कानूनी रास्ता भी अपनाया जा सकता है।
बंशीधर ब्रजवासी ने क्या सफाई दी?
विवाद बढ़ने के बाद बंशीधर ब्रजवासी ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने भाजपा को समर्थन दिया है, लेकिन पार्टी की औपचारिक सदस्यता नहीं ली है। उनका कहना है कि वह मुख्यमंत्री से अपने क्षेत्र और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करने पहुंचे थे।
हालांकि, इस मामले में एक अहम बात यह है कि शुरुआती घटनाक्रम के दौरान उनके भाजपा कार्यालय में सदस्यता पर्ची के साथ तस्वीरें सामने आई थीं और पहले पार्टी में शामिल होने की बात भी कही गई थी। बाद में उनका बयान बदलने से विवाद और गहरा गया।
राहुल राज के मामले में भी रिपोर्टों में अंतर देखने को मिला है। कुछ खबरों में उनके भाजपा की सदस्यता लेने की पुष्टि का जिक्र है, जबकि भाजपा की ओर से बाद में दोनों को केवल समर्थक बताया गया। इसलिए दोनों की औपचारिक सदस्यता को लेकर स्थिति पूरी तरह निर्विवाद नहीं है।
क्या कहता है संविधान का दल-बदल कानून?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची को समझना जरूरी है। इसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था।
इस कानून के पैराग्राफ 2(2) के अनुसार, यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है, तो उसे सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। किसी निर्दलीय MLC का किसी सरकार या राजनीतिक दल को बाहर से समर्थन देना और औपचारिक रूप से उस दल में शामिल होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
केवल समर्थन देना: निर्दलीय सदस्य किसी सरकार को समर्थन दे सकता है। केवल समर्थन देने से अपने आप सदस्यता समाप्त नहीं होती।
पार्टी की सदस्यता लेना: यदि निर्वाचित निर्दलीय सदस्य औपचारिक रूप से किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का सवाल उठ सकता है।
इसलिए इस मामले में अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों नेताओं ने वास्तव में भाजपा की सदस्यता ली थी या केवल समर्थन देने की घोषणा की थी।
भाजपा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकार के लिए इन दोनों निर्दलीय MLC का समर्थन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधान परिषद में समर्थन बढ़ने से सरकार को अपने पक्ष में राजनीतिक मजबूती मिल सकती है।
हालांकि, इस घटनाक्रम ने NDA के भीतर भी सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों निर्दलीय नेताओं ने चुनाव में JDU उम्मीदवारों को हराया था। ऐसे में उनके भाजपा के साथ जाने को लेकर गठबंधन की राजनीति पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बिहार विधान परिषद के सभापति की होगी। विपक्ष की ओर से सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई गई है। अब यह देखना होगा कि शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है और दोनों नेताओं की सदस्यता को लेकर क्या संवैधानिक निर्णय सामने आता है।
इस पूरे विवाद का निष्कर्ष यही है कि भाजपा को समर्थन देना अपने आप में दल-बदल नहीं है, लेकिन निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद भाजपा की औपचारिक सदस्यता लेना अयोग्यता का आधार बन सकता है। अभी दोनों नेताओं की सदस्यता समाप्त होने का कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।
बिहार का यह राजनीतिक घटनाक्रम आने वाले दिनों में और दिलचस्प हो सकता है। अब सबकी नजरें विधान परिषद के सभापति के फैसले और भाजपा तथा दोनों निर्दलीय MLC के अगले कदम पर टिकी हैं।
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