सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 9 जून 2026
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अवैध पुलिस हिरासत के मामलों पर बेहद सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पोस्ट में कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों के वेतन से ₹25,000 प्रतिदिन की दर से मुआवजा वसूला जाएगा। साथ ही, एक मामले में 8 दिनों की अवैध हिरासत के लिए ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश भी बताया गया है।
जब इन दावों की जांच की गई, तो पता चला कि वायरल पोस्ट पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसमें कुछ तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर या सामान्य नियम के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
क्या सच है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले में यह स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखना, बिना मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए, संविधान और कानून के खिलाफ है। अदालत ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन माना।
एक मामले में अदालत ने अवैध हिरासत के शिकार व्यक्ति को ₹25,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह चाहे तो इस राशि की वसूली दोषी अधिकारी से कर सकती है, जिसमें वेतन से कटौती भी शामिल हो सकती है।
यानी “वेतन से वसूली” वाली बात पूरी तरह झूठ नहीं है, लेकिन अदालत ने इसे हर मामले में अनिवार्य नियम के रूप में लागू नहीं किया है।
₹25,000 प्रतिदिन वाला दावा कितना सही?
वायरल पोस्ट का सबसे चर्चित हिस्सा ₹25,000 प्रतिदिन मुआवजे का दावा है।
उपलब्ध न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हालिया मामले में कुल ₹25,000 मुआवजा दिया था, न कि ₹25,000 प्रतिदिन की स्थायी दर तय की थी। अदालत ने ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम घोषित नहीं किया कि भविष्य में हर अवैध हिरासत पर प्रतिदिन ₹25,000 देना होगा।
इसलिए वायरल पोस्ट का यह हिस्सा भ्रामक माना जा सकता है।
₹2 लाख मुआवजे का मामला क्या है?
यह दावा काफी हद तक सही प्रतीत होता है।
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में 8 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने पाया कि कानून के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था और व्यक्ति को अनावश्यक रूप से हिरासत में रखा गया।
हालांकि यह आदेश उस विशेष मामले के तथ्यों पर आधारित था। इसे पूरे राज्य में हर मामले के लिए तय मुआवजा मानना गलत होगा।
अदालत ने पुलिस पर क्या टिप्पणी की?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेशों में पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि कई बार अधिकारियों को लगता है कि नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करने पर जवाबदेही तय नहीं होगी क्योंकि बहुत कम लोग अदालत तक पहुंचते हैं।
एक अन्य मामले में अदालत ने उत्तर प्रदेश में निवारक हिरासत (Preventive Detention) के बढ़ते उपयोग पर भी सवाल उठाए और कहा कि कुछ स्थानों पर इन शक्तियों का दुरुपयोग किया जा रहा है।
क्या पूरे उत्तर प्रदेश में नए नियम लागू हो गए हैं?
वायरल पोस्ट में यह दावा भी किया गया है कि हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश के लिए नए नियम लागू कर दिए हैं और प्रयागराज पुलिस कमिश्नर से 14 सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।
उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में ऐसे व्यापक राज्यव्यापी दिशा-निर्देश या 14 सितंबर की अनुपालन रिपोर्ट का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिला। इसलिए इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है।
निष्कर्ष
वायरल पोस्ट में कुछ बातें वास्तविक न्यायिक आदेशों पर आधारित हैं, लेकिन उन्हें सामान्य नियम की तरह प्रस्तुत कर दिया गया है।
फैक्ट चेक निष्कर्ष:
✅ 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत को हाईकोर्ट ने गैरकानूनी माना है।
✅ अदालत ने कुछ मामलों में मुआवजा देने के आदेश दिए हैं।
✅ राज्य को दोषी अधिकारी के वेतन से राशि वसूलने की अनुमति दी गई है।
✅ 8 दिन की अवैध हिरासत वाले मामले में ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश सामने आया है।
❌ ₹25,000 प्रतिदिन का सार्वभौमिक नियम घोषित होने का दावा प्रमाणित नहीं है।
❌ पूरे उत्तर प्रदेश में नए स्थायी नियम लागू होने का दावा उपलब्ध रिपोर्टों से पूरी तरह पुष्ट नहीं होता।
कुल मिलाकर, वायरल पोस्ट आंशिक रूप से सही (Partly True) है। अदालत ने अवैध हिरासत के खिलाफ कड़ा रुख जरूर अपनाया है, लेकिन सोशल मीडिया पर बताए गए कुछ दावे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं।
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