सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 1 नवंबर 2026
ब्रिटेन में गुलामी के पुराने इतिहास को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। देश के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने ब्रिटेन की ओर से अटलांटिक पार गुलामों के व्यापार के लिए औपचारिक माफी की मांग पर सकारात्मक रुख दिखाया है। हालांकि उन्होंने गुलामी से प्रभावित देशों और उनके वंशजों को आर्थिक मुआवजा देने की मांग को खारिज कर दिया है।
प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब कैरेबियाई देश ब्रिटेन से अपने ऐतिहासिक गुलामी के दौर को स्वीकार करने, माफी मांगने और उसके लंबे समय तक पड़े सामाजिक तथा आर्थिक प्रभावों के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं।
आखिर ब्रिटेन पर गुलामी के इतिहास को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
इस पूरे विवाद की जड़ कई सौ साल पुराने इतिहास में है। ब्रिटेन अटलांटिक पार गुलामों के व्यापार में एक बड़ी भूमिका निभाने वाले देशों में शामिल था। उस दौर में अफ्रीका से लाखों लोगों को जबरन पकड़कर जहाजों के जरिए अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्रों में ले जाया गया था।
वहां इन लोगों से खेतों, गन्ने के बागानों और दूसरे कामों में बिना आजादी और उचित अधिकारों के जबरन मजदूरी कराई जाती थी। उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था और कई लोगों की यात्रा के दौरान या काम करते हुए मौत हो जाती थी।
ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, ब्रिटेन ने लगभग 32 लाख अफ्रीकी लोगों को अटलांटिक पार गुलामी के व्यापार के तहत ले जाने में भूमिका निभाई थी।
हालांकि ब्रिटेन ने 1807 में गुलामों के व्यापार को गैरकानूनी घोषित किया और 1833 में ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकांश क्षेत्रों में गुलामी समाप्त करने का कानून पारित किया। इसके बावजूद गुलामी से प्रभावित देशों का कहना है कि इस व्यवस्था से पैदा हुई आर्थिक और सामाजिक असमानता का असर आज भी दिखाई देता है।
कैरेबियाई देश क्यों मांग रहे हैं औपचारिक माफी?
जमैका, बारबाडोस, गुयाना और एंटीगुआ-बारबुडा सहित कई कैरेबियाई देशों का मानना है कि ब्रिटेन को अपने ऐतिहासिक योगदान और उससे हुए नुकसान की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
इन देशों के नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि गुलामी के दौरान उनके पूर्वजों से जबरन काम कराया गया, उनके अधिकार छीने गए और उनकी मेहनत से औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा।
उनका तर्क है कि गुलामी समाप्त होने के बाद भी प्रभावित समुदायों को गरीबी, शिक्षा की कमी, आर्थिक असमानता और सामाजिक भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
इसी वजह से ये देश केवल इतिहास को याद करने की बात नहीं कर रहे, बल्कि औपचारिक माफी के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास और आर्थिक सहयोग के रूप में सुधारात्मक कदम उठाने की मांग भी कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने क्या कहा?
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने 30 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अपने लेख में कहा कि देश को अपने अतीत से मुंह मोड़ने के बजाय उसका सामना करना चाहिए।
उन्होंने गुलामी के कारण लाखों लोगों को हुई पीड़ा और उसके आज तक बने हुए प्रभावों पर दुख और अफसोस जताया।
उन्होंने प्रभावित देशों और संगठनों के साथ एक व्यवस्थित बातचीत शुरू करने की पेशकश की। इस बातचीत में ब्रिटिश सरकार की ओर से औपचारिक माफी मांगने की मांग को भी शामिल किया जाएगा।
हालांकि आर्थिक मुआवजे पर उनका रुख अलग रहा। उनका कहना है कि आज के ब्रिटिश नागरिकों को कई पीढ़ियों पहले हुए ऐतिहासिक अपराधों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए वह आर्थिक मुआवजे को सही रास्ता नहीं मानते।
मुआवजे की जगह ब्रिटेन क्या करना चाहता है?
प्रधानमंत्री ने आर्थिक मुआवजे के बजाय गरीब कॉमनवेल्थ देशों के कर्ज का बोझ कम करने के लिए नई पहल करने की बात कही है।
इस योजना के तहत कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों को कर्ज चुकाने के लिए अधिक समय और बेहतर ब्याज दरें दिलाने की कोशिश की जाएगी।
इस पहल में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन की भी भूमिका होगी। इसका उद्देश्य गरीब देशों पर कर्ज का दबाव कम करना और उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा तथा विकास पर अधिक खर्च करने का अवसर देना है।
कैरेबियाई देशों की क्या प्रतिक्रिया रही?
बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली ने ब्रिटेन के इस बयान का स्वागत किया है। उनका मानना है कि गुलामी की क्रूरता को स्वीकार करना और औपचारिक माफी पर बातचीत के लिए तैयार होना आगे बढ़ने की दिशा में एक कदम है।
वहीं एंटीगुआ और बारबुडा के प्रधानमंत्री गैस्टन ब्राउन ने भी बातचीत की पेशकश का स्वागत किया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कैरेबियाई देशों की आर्थिक और सामाजिक न्याय से जुड़ी मांगें अभी भी कायम हैं।
कई सामाजिक संगठनों और अभियान चलाने वाले समूहों का कहना है कि केवल माफी से सदियों पुराने नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती। उनके अनुसार, इसके साथ ठोस आर्थिक और सामाजिक कदम भी जरूरी हैं।
कॉमनवेल्थ सम्मेलन में उठ सकता है मुद्दा
1 से 4 नवंबर 2026 तक एंटीगुआ और बारबुडा में कॉमनवेल्थ देशों के नेताओं की बैठक हो रही है। इसमें 56 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है।
इस बैठक में गुलामी के इतिहास, उसके वर्तमान प्रभाव और सुधारात्मक न्याय की मांग पर चर्चा महत्वपूर्ण रहने वाली है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के साथ किंग चार्ल्स तृतीय भी इस सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं।
कुल मिलाकर, ब्रिटेन में गुलामी के इतिहास पर औपचारिक माफी की मांग केवल पुराने इतिहास को दोहराने का मामला नहीं है। यह उन देशों और समुदायों की मांग है, जो मानते हैं कि उनके पूर्वजों के साथ हुए अन्याय के प्रभाव आज भी उनकी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में मौजूद हैं। अब देखना होगा कि ब्रिटेन की ओर से शुरू होने वाली बातचीत किसी औपचारिक माफी और ठोस सहयोग तक पहुंचती है या नहीं।
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