सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 3 अक्टूबर 2026
FCRA क्या है और अचानक इसकी चर्चा क्यों हो रही है?
भारत में विदेश से आने वाले चंदे, अनुदान या अन्य प्रकार के विदेशी योगदान को नियंत्रित करने के लिए Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA लागू है। मौजूदा कानून FCRA, 2010 है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए न हो और विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठन अपने घोषित उद्देश्यों के अनुसार उसका इस्तेमाल करें। गृह मंत्रालय का FCRA पोर्टल भी यही उद्देश्य बताता है।
FCRA केवल किसी एक धर्म या संस्था पर लागू होने वाला कानून नहीं है। इसके दायरे में वे संगठन आते हैं जो विदेशी योगदान प्राप्त करना चाहते हैं और जिनकी गतिविधियां सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक आदि क्षेत्रों से जुड़ी हो सकती हैं।
अब Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 के कारण यह कानून फिर चर्चा में है। यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और अगस्त में इसे विस्तृत जांच के लिए 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेज दिया गया।
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह संशोधन विधेयक अभी कानून नहीं बना है। अक्टूबर 2026 की स्थिति में यह संसद की संयुक्त समिति के विचाराधीन है। दूसरी ओर, FCRA के संशोधित नियम 2026 में लागू हो चुके हैं, इसलिए विधेयक और नियमों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
नए FCRA विधेयक में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
इस विधेयक का सबसे विवादित हिस्सा उन संगठनों की विदेशी फंड से बनी संपत्तियों से जुड़ा है, जिनका FCRA पंजीकरण खत्म हो जाता है।
किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो सकता है, संगठन खुद उसे सरेंडर कर सकता है या उसका नवीनीकरण नहीं हो सकता। प्रस्तावित कानून ऐसी स्थिति में एक Designated Authority की व्यवस्था करता है, जो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन की प्रक्रिया संभालेगी।
सरकार का कहना है कि 2010 के FCRA में विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों के निहित होने यानी vesting का प्रावधान पहले से था, लेकिन उन संपत्तियों को संभालने, प्रबंधित करने और आगे इस्तेमाल करने की विस्तृत प्रक्रिया स्पष्ट नहीं थी। प्रस्तावित संशोधन इसी प्रक्रिया को स्पष्ट करना चाहता है।
संपत्ति का क्या होगा?
सरकार के अनुसार, पंजीकरण खत्म होते ही संपत्ति को पहले provisional यानी अस्थायी रूप से Designated Authority के अधीन रखा जाएगा।
यदि संस्था निर्धारित अवधि में अपना FCRA पंजीकरण बहाल करा लेती है, तो विदेशी योगदान और संबंधित संपत्तियां वापस की जा सकती हैं।
लेकिन यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत संपत्तियां स्थायी रूप से vest हो सकती हैं। सरकार का कहना है कि ऐसी संपत्तियों का इस्तेमाल सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जाएगा और बिक्री होने पर रकम Consolidated Fund of India में जमा होगी।
यहीं से सबसे बड़ी बहस शुरू होती है।
विपक्ष को सबसे बड़ी आपत्ति किस बात पर है?
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की मुख्य चिंता यह है कि FCRA पंजीकरण खत्म होने की स्थिति में किसी संस्था की विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है।
कांग्रेस महासचिव और सांसद केसी वेणुगोपाल ने इस विधेयक को लेकर लगातार सवाल उठाए हैं। अगस्त में उन्होंने आरोप लगाया था कि इसका असर NGOs और अल्पसंख्यक संस्थानों पर पड़ सकता है और विधेयक वापस लेने की मांग की थी।
अब 1 अक्टूबर 2026 को वेणुगोपाल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर JPC की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि विधेयक पर संबंधित हितधारकों से पर्याप्त और सार्थक चर्चा नहीं हो रही है। उन्होंने मांग की कि विधेयक पर आगे बढ़ने से पहले JPC को विस्तृत परामर्श और जांच का पर्याप्त समय दिया जाए।
JPC के कुछ सदस्यों ने भी अधिक समय की मांग की है। 30 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, समिति के नौ सदस्यों ने 12 अक्टूबर की बैठक टालने और सार्वजनिक तथा संबंधित संगठनों से कम-से-कम चार सप्ताह तक सुझाव लेने की मांग की। इनमें कांग्रेस, DMK, समाजवादी पार्टी और NDA के एक सहयोगी दल के प्रतिनिधि भी शामिल बताए गए हैं।
इससे साफ है कि विवाद सिर्फ विधेयक की विषय-वस्तु पर नहीं, बल्कि विधेयक की संसदीय जांच और stakeholder consultation की प्रक्रिया पर भी है।
क्या कांग्रेस का आरोप है कि यह कानून अल्पसंख्यकों को निशाना बनाएगा?
हां, कांग्रेस के नेताओं ने ऐसा आरोप लगाया है। केसी वेणुगोपाल ने विधेयक को NGOs और minorities को प्रभावित करने वाला बताया है। कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने भी धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।
लेकिन इसे एक महत्वपूर्ण तथ्य के साथ समझना जरूरी है।
सरकार इन आरोपों को खारिज करती है। सरकार का कहना है कि विधेयक किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है और इसमें धार्मिक स्थलों की धार्मिक पहचान बनाए रखने का स्पष्ट प्रावधान है।
प्रस्तावित कानून में यदि विदेशी फंड से बनी संपत्ति किसी पूजा स्थल से संबंधित है, तो Designated Authority को उसका धार्मिक चरित्र बनाए रखना होगा। सरकार का कहना है कि वह उसे किसी दूसरे उद्देश्य में बदल नहीं सकती।
इसलिए यहां तथ्य और राजनीतिक आरोप को अलग रखना जरूरी है: विपक्ष संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जता रहा है, जबकि सरकार कह रही है कि विधेयक का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विदेशी फंड और उससे बनी संपत्तियों की कानूनी व्यवस्था को स्पष्ट करना है।
FCRA में 2026 में और क्या बदलाव महत्वपूर्ण हैं?
विधेयक के अलावा 22 जून 2026 को लागू किए गए FCRA Rules में भी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
1. काम और क्षेत्र की स्पष्ट जानकारी
अब FCRA पंजीकरण में संगठन को अपने विशिष्ट उद्देश्य और किन राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में काम करना है, यह स्पष्ट करना होगा।
सरकार का तर्क है कि इससे यह स्पष्ट रहेगा कि विदेशी फंड प्राप्त करने वाला संगठन किस उद्देश्य और क्षेत्र में काम कर रहा है।
2. ₹10 लाख के इस्तेमाल की शर्त
नवीनीकरण के लिए संगठन को पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम-से-कम ₹10 लाख के विदेशी योगदान का इस्तेमाल करने की शर्त जोड़ी गई है।
सरकार इसे सक्रिय और वास्तविक रूप से काम कर रहे संगठनों की पहचान करने की व्यवस्था बताती है। लेकिन PRS ने सवाल उठाया है कि ‘reasonable activity’ को इस तरह ₹10 लाख के खर्च से परिभाषित करना क्या उचित है, खासकर छोटे संगठनों के लिए।
इसका मतलब यह हो सकता है कि छोटे NGOs, जिनका काम कम बजट में चलता है, उनके लिए FCRA नवीनीकरण अधिक चुनौतीपूर्ण हो।
3. ज्यादा रिपोर्टिंग
नए नियमों के तहत सालाना रिपोर्ट में परियोजना और गतिविधि के स्तर पर विदेशी फंड के इस्तेमाल की जानकारी, वेबसाइट और सोशल मीडिया की जानकारी तथा अंतिम विदेशी दाता की पहचान जैसी अतिरिक्त जानकारी मांगी गई है।
इससे पारदर्शिता बढ़ सकती है, लेकिन संस्थाओं पर compliance यानी प्रशासनिक काम का बोझ भी बढ़ सकता है।
4. जांच को लेकर केंद्र की भूमिका
प्रस्तावित विधेयक में FCRA के तहत जांच शुरू करने से पहले राज्य एजेंसियों को केंद्र सरकार की अनुमति लेने की व्यवस्था प्रस्तावित है। सरकार का कहना है कि चूंकि FCRA केंद्रीय कानून है और विदेशी संबंध तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलू इसमें शामिल हैं, इसलिए इससे अलग-अलग एजेंसियों की समानांतर जांच से बचा जा सकेगा।
विपक्ष और आलोचक इसके उलट यह सवाल उठा सकते हैं कि इससे राज्यों की स्वतंत्र जांच क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
एक महत्वपूर्ण बात: सजा कम भी की जा रही है
इस विधेयक में केवल नियंत्रण बढ़ाने वाले प्रावधान ही नहीं हैं।
प्रस्तावित संशोधन में FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास की सजा पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रावधान है। यानी इस मामले में प्रस्तावित बदलाव सजा को कठोर करने के बजाय कम करने वाला है।
साथ ही Designated Authority के आदेश के खिलाफ revision और District Judge के सामने appeal का प्रावधान भी प्रस्तावित है।
आम लोगों पर इसका क्या असर हो सकता है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि FCRA सीधे आम नागरिकों के रोजमर्रा के बैंक खाते, वेतन या सामान्य घरेलू लेन-देन को नियंत्रित करने वाला कानून नहीं है।
इसका सीधा असर मुख्य रूप से उन संस्थाओं पर पड़ता है जो विदेशी योगदान प्राप्त करती हैं।
लेकिन अप्रत्यक्ष असर आम लोगों तक पहुंच सकता है।
शिक्षा पर असर
यदि कोई NGO या धार्मिक/सामाजिक संस्था विदेशी फंड से स्कूल या शिक्षा संबंधी कार्यक्रम चलाती है, तो उसके FCRA पंजीकरण और फंडिंग व्यवस्था में बदलाव से उसकी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं पर असर
कई सामाजिक संस्थाएं स्वास्थ्य शिविर, अस्पताल, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं या अन्य कल्याणकारी कार्यक्रम चलाती हैं। यदि किसी संस्था के विदेशी फंड पर निर्भर काम में प्रशासनिक या वित्तीय बाधाएं आती हैं, तो उसका असर लाभार्थियों पर पड़ सकता है।
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों पर प्रभाव
विपक्षी नेताओं ने विशेष रूप से उन संगठनों का मुद्दा उठाया है जो दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।
हालांकि यह कहना अभी सही नहीं होगा कि विधेयक लागू होने के बाद ऐसी सेवाएं निश्चित रूप से बंद हो जाएंगी। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून क्या बनता है और उसके तहत प्रशासनिक निर्णय कैसे लिए जाते हैं।
NGOs पर compliance का बोझ
छोटे संगठनों के लिए ₹10 लाख के उपयोग की शर्त, अधिक रिपोर्टिंग और गतिविधि/क्षेत्र का स्पष्ट विवरण जैसी व्यवस्थाएं अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारी पैदा कर सकती हैं। PRS ने विशेष रूप से ₹10 लाख वाली शर्त को लेकर सवाल उठाए हैं।
अभी FCRA विधेयक की स्थिति क्या है?
अक्टूबर 2026 की स्थिति में FCRA Amendment Bill अभी कानून नहीं बना है।
इसका घटनाक्रम इस प्रकार है:
25 मार्च 2026: विधेयक लोकसभा में पेश हुआ।
12 अगस्त 2026: इसे 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC को भेजा गया।
सितंबर 2026: JPC ने विधेयक पर विचार शुरू किया।
30 सितंबर 2026: समिति के कुछ सदस्यों ने अधिक समय और व्यापक सार्वजनिक परामर्श की मांग की।
1 अक्टूबर 2026: कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर JPC में पर्याप्त stakeholder consultation न होने का मुद्दा उठाया।
इसलिए अभी अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है। JPC की सिफारिशों के बाद विधेयक में बदलाव हो सकते हैं और उसके बाद ही संसद में इसकी आगे की प्रक्रिया होगी।
निष्कर्ष: असली विवाद आखिर है क्या?
FCRA का मूल उद्देश्य विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना और यह सुनिश्चित करना है कि उसका इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हित के खिलाफ न हो। इस उद्देश्य पर सरकार और विपक्ष के बीच मूलभूत मतभेद नहीं हैं।
विवाद मुख्य रूप से सरकारी निगरानी की सीमा, विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण, FCRA नवीनीकरण की शर्तों, जांच की प्रक्रिया और NGOs तथा धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं पर संभावित प्रभाव को लेकर है।
सरकार का पक्ष है कि मौजूदा व्यवस्था में कानूनी और प्रशासनिक कमियां थीं, जिन्हें दूर करने के लिए Designated Authority, संपत्ति प्रबंधन की स्पष्ट प्रक्रिया, न्यायिक अपील और अधिक पारदर्शिता जैसे प्रावधान जरूरी हैं।
वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की चिंता है कि इन प्रावधानों से केंद्र सरकार को NGOs और कुछ सामाजिक/धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों और गतिविधियों पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है तथा इसलिए विधेयक पर व्यापक सार्वजनिक और संसदीय चर्चा होनी चाहिए।
सावधान नेशन न्यूज़…