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सावधान नेशन न्यूज़

AI की रफ्तार बनाम पर्यावरण की चिंता, भारत में डेटा सेंटर परियोजनाओं का विरोध तेज

सावधान नेशन न्यूज़

नई दिल्ली, 9 अक्टूबर 2026

भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक का बड़ा केंद्र बनाने की कोशिशों के बीच अब डेटा सेंटरों के पर्यावरणीय प्रभाव पर बहस तेज हो गई है। Amazon, Microsoft और Google जैसी बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियां भारत में डेटा सेंटर और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के लिए बड़े निवेश कर रही हैं। लेकिन कुछ परियोजनाओं के आसपास रहने वाले लोग पानी, बिजली, शोर और स्थानीय पर्यावरण पर संभावित असर को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
रॉयटर्स की 9 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन तीनों कंपनियों ने मिलकर 2030 तक भारत में डेटा सेंटरों के लिए लगभग 56.5 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धताएं जताई हैं।


AI को डेटा सेंटरों की जरूरत क्यों है?
जब कोई व्यक्ति AI से सवाल पूछता है, तस्वीर बनवाता है या किसी डिजिटल सेवा का इस्तेमाल करता है, तो उसके पीछे बड़े कंप्यूटर सिस्टम काम करते हैं। इन सिस्टमों को चलाने और डेटा सुरक्षित रखने के लिए विशाल डेटा सेंटरों की आवश्यकता होती है।
इन केंद्रों में हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं। इन्हें ठंडा रखने, बिजली उपलब्ध कराने और नेटवर्क को चालू रखने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है।


पानी और बिजली को लेकर चिंता
डेटा सेंटरों में संसाधनों की खपत उनकी तकनीक, क्षमता और कूलिंग सिस्टम पर निर्भर करती है। कुछ प्रणालियां ठंडा करने के लिए पानी का इस्तेमाल करती हैं, जबकि दूसरी प्रणालियों में पानी की खपत काफी कम हो सकती है।
भारत के कई हिस्सों में पहले से ही पानी की उपलब्धता एक चुनौती है। ऐसे क्षेत्रों में बड़े डेटा सेंटर स्थापित होने पर स्थानीय जल संसाधनों और बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि हर डेटा सेंटर समान मात्रा में पानी या बिजली खर्च करता है। वास्तविक प्रभाव का आकलन संबंधित परियोजना के आंकड़ों से ही किया जा सकता है।


महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में क्यों उठ रहे हैं सवाल?
रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई के निकट Amazon की डेटा सेंटर परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों ने शोर, पानी, बिजली और रिहायशी इलाकों पर प्रभाव से जुड़ी चिंताएं उठाई हैं।
वहीं, आंध्र प्रदेश में Google की प्रस्तावित लगभग 15 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजना को लेकर भी पर्यावरण संबंधी आपत्तियां और विरोध सामने आए हैं। इनमें जल संसाधनों और वन्यजीव अभयारण्य के निकट परियोजना की स्थिति को लेकर चिंताएं शामिल हैं।
इन आपत्तियों का अर्थ यह नहीं है कि सभी आरोप साबित हो चुके हैं। परियोजनाओं के वास्तविक प्रभाव का निर्धारण संबंधित पर्यावरणीय आकलन, जल उपयोग के आंकड़ों और नियामकीय जांच के आधार पर होना चाहिए।


कंपनियों और सरकार का क्या कहना है?
Amazon का कहना है कि भारत में उसके डेटा सेंटरों में सर्वर ठंडा करने के लिए पीने योग्य पानी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। कंपनी अपनी थाणे परियोजना के लिए बंद-चक्र कूलिंग तकनीक इस्तेमाल करने की बात भी कह चुकी है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि डेटा सेंटरों की बिजली और पानी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण और उन्नत कूलिंग तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट से बढ़कर 2025 में करीब 1,500 मेगावाट हो गई थी।


भारत के सामने क्या चुनौती है?
डेटा सेंटर निवेश से डिजिटल सेवाओं, तकनीकी बुनियादी ढांचे और रोजगार के कुछ अवसर बढ़ सकते हैं। लेकिन इन लाभों के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि स्थानीय निवासियों को पानी और बिजली की उपलब्धता में परेशानी न हो तथा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जाए।


निष्कर्ष: भारत के लिए AI में आगे बढ़ना आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन विकास की सफलता केवल निवेश की रकम से नहीं मापी जा सकती। इसके लिए पारदर्शी पर्यावरणीय आकलन, संसाधनों के उपयोग की जानकारी और स्थानीय समुदायों की चिंताओं का समाधान भी जरूरी है।

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