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सावधान नेशन न्यूज़

भारत में बढ़ी जीवन प्रत्याशा, लेकिन असली चुनौती अभी बाकी: WHO की रिपोर्ट ने दिखाई स्वास्थ्य क्षेत्र की पूरी तस्वीर

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नई दिल्ली, 4 अक्टूबर 2026

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी WHO की ताजा जानकारी ने एक तरफ देश के लिए उम्मीद बढ़ाई है, तो दूसरी तरफ कई ऐसी चुनौतियों की ओर भी ध्यान खींचा है जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी खबर यह है कि भारत में जीवन प्रत्याशा यानी Life Expectancy में महामारी के बाद उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
WHO से जुड़े ताजा आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के मुताबिक भारत में 2021 के लगभग 68.1–68.5 वर्ष के स्तर से जीवन प्रत्याशा 2023 में करीब 71 वर्ष तक पहुंच गई। यानी दो वर्षों में लगभग 2.9 वर्ष की वापसी/बढ़ोतरी हुई।

लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवन प्रत्याशा बढ़ना यह नहीं बताता कि हर भारतीय 71 वर्ष तक स्वस्थ रहेगा। WHO जीवन प्रत्याशा और Healthy Life Expectancy को अलग-अलग मापता है। स्वस्थ जीवन प्रत्याशा में यह देखा जाता है कि व्यक्ति कितने वर्ष अपेक्षाकृत अच्छे स्वास्थ्य में जी सकता है।

यही अंतर इस पूरी खबर को और महत्वपूर्ण बनाता है।


सबसे पहले समझिए—जीवन प्रत्याशा क्या होती है?
जीवन प्रत्याशा का सामान्य अर्थ है कि वर्तमान मृत्यु-दरों और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर जन्म लेने वाला बच्चा औसतन कितने वर्ष जी सकता है।
यह किसी एक व्यक्ति की भविष्यवाणी नहीं होती।
अगर किसी देश में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है, तो सामान्य तौर पर इसका मतलब हो सकता है कि वहां बच्चों की मृत्यु कम हो रही है, मातृ स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है, संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण बढ़ रहा है, इलाज तक पहुंच सुधर रही है और कई बीमारियों से समय पर बचाव या उपचार संभव हो रहा है।
WHO भी जीवन प्रत्याशा को किसी आबादी के स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण तस्वीर मानता है।

भारत के मामले में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोविड-19 महामारी के दौरान मृत्यु-दर में हुए बदलावों ने जीवन प्रत्याशा को प्रभावित किया था। अब उसमें फिर सुधार दिखाई दे रहा है।


भारत की स्थिति पाकिस्तान से बेहतर, लेकिन बांग्लादेश से पीछे
ताजा रिपोर्टों के अनुसार 2023 में भारत की जीवन प्रत्याशा लगभग 71 वर्ष बताई गई है, जबकि पाकिस्तान में यह करीब 68.2 वर्ष थी।
इसका मतलब है कि इस पैमाने पर भारत पाकिस्तान से आगे निकल चुका है। लेकिन पड़ोसी बांग्लादेश लगभग 72.2 वर्ष के साथ भारत से आगे बताया गया है।
वहीं अमेरिका और कनाडा जैसे विकसित देशों में जीवन प्रत्याशा इससे काफी अधिक है—रिपोर्ट में अमेरिका के लिए करीब 78.5 वर्ष और कनाडा के लिए करीब 81.4 वर्ष के आंकड़े बताए गए हैं।

इस तुलना से एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—
क्या भारत को सिर्फ जीवन प्रत्याशा बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए या लोगों को ज्यादा वर्षों तक स्वस्थ रखने पर भी?
इसका जवाब है—दोनों पर।


सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ 2.9 साल की बढ़ोतरी नहीं
अगर केवल आंकड़ा देखा जाए तो 2.9 वर्ष की बढ़ोतरी बहुत अच्छी खबर लगती है। लेकिन इसके पीछे स्वास्थ्य व्यवस्था में हुए कई बदलावों को देखना जरूरी है।
भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के घरों के नजदीक पहुंचाने के लिए Ayushman Arogya Mandirs का विस्तार हुआ है।
WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस ने भी भारत की स्वास्थ्य प्रगति का उल्लेख करते हुए इन केंद्रों, ASHA कार्यकर्ताओं, टीकाकरण और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुई प्रगति की सराहना की है।

और यहां एक और महत्वपूर्ण अपडेट है।
सरकारी Ayushman Arogya Mandir पोर्टल के अनुसार 3 अक्टूबर 2026 तक 1,87,191 Ayushman Arogya Mandir कार्यरत बताए गए हैं।

इन केंद्रों का उद्देश्य सिर्फ बीमारी होने के बाद इलाज करना नहीं है, बल्कि बीमारी की रोकथाम, जांच, शुरुआती पहचान, उपचार, पुनर्वास और जरूरत पड़ने पर आगे के अस्पताल में रेफरल जैसी सेवाओं को मजबूत करना है।


कैंसर, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की जांच क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत अब सिर्फ संक्रामक बीमारियों से नहीं जूझ रहा।
आज बड़ी चुनौती Non-Communicable Diseases यानी गैर-संचारी बीमारियां हैं।
इनमें—
हाई ब्लड प्रेशर
डायबिटीज
हृदय रोग
कैंसर
स्ट्रोक
कुछ अन्य लंबे समय तक चलने वाली बीमारियां
शामिल हैं।


Ayushman Arogya Mandirs में इन बीमारियों की स्क्रीनिंग और शुरुआती प्रबंधन को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा बनाया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025 तक इन केंद्रों के माध्यम से करोड़ों लोगों की hypertension, diabetes और विभिन्न cancers के लिए screening की जा चुकी थी।

इसका फायदा यह है कि बीमारी गंभीर होने से पहले उसका पता लगाया जा सकता है।
जल्दी पता = जल्दी इलाज = जटिलताओं का कम खतरा।
यही वजह है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका आने वाले वर्षों में और बढ़ने वाली है।


ASHA कार्यकर्ता क्यों इतनी महत्वपूर्ण हैं?
भारत जैसे विशाल देश में हर गांव और हर परिवार तक डॉक्टर को पहुंचाना आसान नहीं है।
ऐसे में ASHA कार्यकर्ता स्वास्थ्य व्यवस्था और आम लोगों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनती हैं।
WHO के अनुसार ASHA कार्यकर्ता माताओं और बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

गर्भावस्था के दौरान जानकारी देना, संस्थागत प्रसव के लिए प्रोत्साहित करना, टीकाकरण की जानकारी, बच्चों के स्वास्थ्य पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में मदद करना—इन क्षेत्रों में उनका योगदान महत्वपूर्ण है।


मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में भी बड़ा बदलाव
WHO प्रमुख ने भारत में institutional deliveries में बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया।
उनके अनुसार संस्थागत प्रसव का स्तर 78% से बढ़कर 93% हुआ है।

इसका सीधा संबंध मातृ और नवजात स्वास्थ्य से है क्योंकि अस्पताल या स्वास्थ्य संस्थान में प्रसव होने पर प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं में तत्काल चिकित्सा सहायता मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
हालांकि, अलग-अलग सर्वेक्षणों और वर्षों के आंकड़े अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए हालिया NFHS-6 रिपोर्ट में संस्थागत प्रसव 90.6% बताया गया है। इसलिए अलग स्रोतों के प्रतिशतों को एक ही समय का आंकड़ा मानना सही नहीं होगा।

यही वजह है कि खबरों में आंकड़े बताते समय स्रोत और वर्ष बताना बेहद जरूरी है।


लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा चिंता पैदा करता है
भारत में लोग ज्यादा वर्षों तक जी रहे हैं, स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ रही हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत हो रही है।
फिर भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है—
सड़क दुर्घटनाएं।
WHO के अनुसार सड़क दुर्घटनाएं पूरी दुनिया में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या हैं। हर साल दुनिया में लगभग 11.6 लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में होती है और करोड़ों लोग गैर-घातक चोटों का सामना करते हैं।

भारत के लिए यह चुनौती इसलिए और गंभीर है क्योंकि सड़क दुर्घटनाओं में सिर्फ मौत नहीं होती।
कई लोग—
स्थायी विकलांगता का शिकार होते हैं,
लंबे समय तक इलाज कराते हैं,
काम करने की क्षमता खो देते हैं,
परिवार की आय प्रभावित होती है,
और परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।
इसलिए सड़क सुरक्षा को सिर्फ Transport Department की समस्या मानना गलत होगा।
यह Public Health Issue भी है।


पुरुषों और महिलाओं के लिए भी अलग चुनौतियां
रिपोर्ट में पुरुषों और महिलाओं के मृत्यु/चोट के कारणों में अंतर भी दिखाई देता है।
आपके दिए गए WHO आंकड़ों के अनुसार road traffic injuries दोनों लिंगों को मिलाकर प्रमुख कारणों में शामिल हैं। पुरुषों में सड़क दुर्घटनाएं आठवें प्रमुख कारण के रूप में और महिलाओं में falls यानी गिरने से होने वाली चोटें आठवें स्थान पर बताई गई हैं।
इससे यह समझ आता है कि स्वास्थ्य नीति सिर्फ अस्पताल बनाने तक सीमित नहीं हो सकती।
हमें यह भी देखना होगा कि लोग बीमार या घायल क्यों हो रहे हैं।


तो आने वाले समय में क्या बदलाव देखने को मिल सकता है?
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था का अगला चरण केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
सबसे बड़ा बदलाव Preventive Healthcare यानी बीमारी होने से पहले रोकथाम की दिशा में होना चाहिए।
आने वाले समय में पांच क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है—


1. बीमारी की शुरुआती जांच
हाई BP, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों को गंभीर अवस्था में पहुंचने से पहले पकड़ना होगा।


2. गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता
केंद्र खोलना पर्याप्त नहीं है। वहां डॉक्टर, नर्स, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, दवाएं, जांच और रेफरल व्यवस्था भी लगातार उपलब्ध होनी चाहिए।


3. सड़क सुरक्षा
सड़क डिजाइन, हेलमेट, सीट बेल्ट, तेज गति पर नियंत्रण, नशे में ड्राइविंग रोकना और दुर्घटना के बाद तत्काल emergency care—इन सभी को मजबूत करना होगा।


4. Healthy Life Expectancy
सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं कि व्यक्ति 70 या 75 वर्ष तक जीवित रहे।
महत्वपूर्ण यह भी है कि वह कितने वर्ष स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जी पाए।
5. स्वास्थ्य पर परिवार का खर्च कम करना
WHO के भारत संबंधी आंकड़ों के अनुसार 2021-22 में household expenditure स्वास्थ्य पर होने वाले कुल स्वास्थ्य खर्च का लगभग 44.1% था।

इसलिए स्वास्थ्य बीमा के साथ-साथ सस्ती दवाएं, जांच और मजबूत सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं भी जरूरी हैं।


क्या भारत को अभी संतुष्ट हो जाना चाहिए?
नहीं।
2.9 वर्ष की जीवन प्रत्याशा वृद्धि निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता।


भारत की चुनौती अब यह है कि—
लोग सिर्फ ज्यादा वर्ष न जिएं, बल्कि ज्यादा स्वस्थ वर्ष जिएं।
अगर किसी व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा 71 वर्ष है लेकिन जीवन के अंतिम 10–15 वर्ष गंभीर बीमारी, विकलांगता या आर्थिक परेशानी में गुजरते हैं, तो केवल जीवन प्रत्याशा का आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं बताता।
इसीलिए Healthy Life Expectancy ज्यादा महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक है।
रिपोर्टों के अनुसार भारत की healthy life expectancy 2023 में लगभग 60.6 वर्ष थी। यानी सामान्य जीवन प्रत्याशा और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के बीच काफी अंतर मौजूद है।

सबसे बड़ा संदेश क्या है?
WHO के आंकड़े भारत को न तो पूरी तरह सफलता की कहानी बताते हैं और न ही पूरी तरह चिंता की।
तस्वीर मिश्रित है।


एक तरफ—
✅ जीवन प्रत्याशा में सुधार
✅ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
✅ Ayushman Arogya Mandirs की बढ़ती संख्या
✅ hypertension और diabetes की screening
✅ cancer की शुरुआती जांच
✅ ASHA कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका
✅ टीकाकरण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य में सुधार
✅ संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी


दूसरी तरफ—
⚠️ सड़क दुर्घटनाएं
⚠️ गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता बोझ
⚠️ स्वस्थ जीवन और कुल जीवन प्रत्याशा के बीच बड़ा अंतर
⚠️ स्वास्थ्य खर्च का परिवारों पर बोझ
⚠️ ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की जरूरत
इन दोनों तस्वीरों को साथ देखकर ही भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र का वास्तविक मूल्यांकन किया जा सकता है।


निष्कर्ष: अब लक्ष्य सिर्फ लंबी जिंदगी नहीं, बेहतर जिंदगी होना चाहिए
भारत की जीवन प्रत्याशा में लगभग 2.9 वर्ष की बढ़ोतरी निश्चित रूप से देश के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन यह उपलब्धि हमें रुकने के बजाय अगला लक्ष्य तय करने की प्रेरणा देती है।


अब भारत को ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है जहां व्यक्ति को बीमारी होने के बाद अस्पताल पहुंचने का इंतजार न करना पड़े, बल्कि बीमारी की शुरुआत में ही उसकी पहचान हो जाए।
जहां गांव के स्वास्थ्य केंद्र में जरूरी जांच उपलब्ध हो।
जहां ASHA कार्यकर्ता को पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन मिलें।
जहां कैंसर, डायबिटीज और hypertension की नियमित जांच सामान्य स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बने।
और जहां सड़क पर निकलना किसी परिवार के लिए जीवन-मृत्यु का अनिश्चित जोखिम न बने।


क्योंकि असली स्वास्थ्य प्रगति सिर्फ यह नहीं कि हम कितने साल जीते हैं—असली प्रगति यह है कि उन वर्षों में हम कितने स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से जीते हैं।

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