सावधान नेशन न्यूज़
लखनऊ, 12 जून 2026
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आई एक चिंताजनक स्थिति ने बच्चों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले छह महीनों के भीतर शहर में 261 नाबालिग लड़कियों के लापता होने या अपहरण से जुड़े मामले दर्ज किए गए। हालांकि इनमें से बड़ी संख्या में बच्चियों को पुलिस ने सुरक्षित बरामद कर लिया, लेकिन 34 बच्चियां अब भी लापता बताई जा रही हैं। इसी मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस प्रशासन से जवाब मांगा है।
मामला अदालत तक कैसे पहुंचा?
यह मुद्दा तब अदालत के सामने आया जब एक 12 वर्षीय बच्ची की बरामदगी से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई की जा रही थी। अदालत ने संबंधित मामले में हस्तक्षेप किया, जिसके बाद बच्ची को बरामद कर लिया गया। लेकिन सुनवाई के दौरान पुलिस प्रशासन की ओर से दाखिल शपथपत्र में जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने अदालत का ध्यान बड़े स्तर पर चल रही समस्या की ओर खींचा।
शपथपत्र में बताया गया कि पिछले छह महीनों में कुल 261 नाबालिग लड़कियों के गुमशुदगी या अपहरण के मामले दर्ज हुए। इनमें से 227 लड़कियों को खोज लिया गया, लेकिन 34 मामलों में अब तक सफलता नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने क्यों जताई चिंता?
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने स्पष्ट कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। अदालत ने माना कि यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं बल्कि बच्चों के अधिकार, सुरक्षा और परिवारों की चिंता का मामला है।
हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन से सभी लंबित मामलों की विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है। साथ ही निर्देश दिया गया कि वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से इन मामलों की निगरानी करें और जांच में किसी प्रकार की ढिलाई पाए जाने पर जिम्मेदारी तय की जाए।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच प्रगति की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई तो इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता माना जा सकता है।
पुलिस प्रशासन का पक्ष
पुलिस अधिकारियों के अनुसार इन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर लिया जा रहा है। लापता बच्चियों की तलाश के लिए विशेष टीमें बनाई गई हैं और कई स्तरों पर जांच जारी है।
पुलिस की कार्रवाई में शामिल हैं:
अलग-अलग क्षेत्रों में विशेष जांच दलों की तैनाती
अन्य जिलों और राज्यों के साथ समन्वय
डिजिटल और तकनीकी साधनों का उपयोग
लंबित मामलों की नियमित समीक्षा
परिवारों से लगातार संपर्क
अधिकारियों का कहना है कि हर मामले को अलग परिस्थितियों के आधार पर देखा जा रहा है और बरामदगी के प्रयास लगातार जारी हैं।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
विशेषज्ञों के अनुसार नाबालिगों के लापता होने के मामलों में कई कारण सामने आते हैं:
परिवार से नाराज होकर घर छोड़ना
बहला-फुसलाकर ले जाना
मानव तस्करी का जोखिम
सोशल मीडिया या ऑनलाइन संपर्क
गलत संगति या दबाव
हालांकि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और किसी निष्कर्ष पर जांच पूरी होने से पहले नहीं पहुंचा जा सकता।
समाज और परिवार की क्या भूमिका है?
ऐसे मामलों को केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं रोका जा सकता। परिवार, स्कूल और समाज सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
कुछ जरूरी सावधानियां:
बच्चों के दैनिक गतिविधियों पर सामान्य निगरानी रखें
ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर जागरूक करें
अचानक व्यवहार में बदलाव पर ध्यान दें
आपात स्थिति में तुरंत पुलिस से संपर्क करें
बच्चों को भरोसे के साथ अपनी बात साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें
आगे क्या होगा?
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 3 जुलाई तय की है। तब तक पुलिस प्रशासन को सभी लंबित मामलों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
यह मामला केवल लखनऊ तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और समाज की जागरूकता पर भी बड़ा सवाल उठाता है। आने वाले समय में अदालत की निगरानी और पुलिस की कार्रवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।
निष्कर्ष:
261 मामलों में 227 बच्चियों की बरामदगी राहत की बात है, लेकिन 34 बच्चियों का अब तक पता न लगना चिंता का विषय बना हुआ है। इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
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