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NoKasa: पुराने कपड़ों को नया जीवन देने का विचार — कैसे शुरू हुई कंपनी और क्या सच में बदलाव आया?

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नई दिल्ली, 12 जून 2026

आज के समय में लोग हर साल नए कपड़े खरीदते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि पुराने कपड़ों का आखिर होता क्या है। कई कपड़े घरों में पड़े रह जाते हैं, कुछ दान हो जाते हैं और बड़ी मात्रा में कपड़े कूड़े या लैंडफिल तक पहुंच जाते हैं। इसी समस्या को देखकर बेंगलुरु के दो युवाओं — Prasad Lingawar और Nachiket Acharya — ने NoKasa नाम की पहल शुरू की।

NoKasa क्या है?
NoKasa एक टेक्नोलॉजी आधारित टेक्सटाइल वेस्ट मैनेजमेंट और सर्कुलर फैशन स्टार्टअप है। इसका मुख्य उद्देश्य पुराने कपड़ों को सीधे कूड़े में जाने से रोकना और उन्हें दोबारा इस्तेमाल (Reuse), अपसाइकिल (Upcycle) या रिसाइकिल (Recycle) करना है।

कंपनी लोगों के घरों या कलेक्शन पॉइंट्स से पुराने कपड़े इकट्ठा करती है और उनकी स्थिति के अनुसार तय करती है कि कपड़े:
दोबारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं,
मरम्मत कर बेचे जा सकते हैं,
रिसाइकिल किए जा सकते हैं,
या अन्य उपयोग में लाए जा सकते हैं।

कंपनी कब बनी?
सार्वजनिक रिकॉर्ड और कंपनी प्रोफाइल के अनुसार NoKasa की स्थापना वर्ष 2024 में हुई थी और इसका मुख्यालय बेंगलुरु, कर्नाटक में है।

इसे शुरू करने की वजह क्या थी?
रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रasad लिंगावर और नचिकेत आचार्य पहले से टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप क्षेत्र से जुड़े थे। दोनों ने बेंगलुरु में बढ़ती कचरा समस्या और खासकर कपड़ों के कचरे को देखा। उन्होंने कई वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम और मैटेरियल रिकवरी सेंटर (MRF) को समझा और महसूस किया कि कपड़ों के लिए संगठित व्यवस्था काफी कम है।

उनका शुरुआती विचार था कि टेक्नोलॉजी की मदद से वेस्ट मैनेजमेंट आसान बनाया जाए। बाद में उन्होंने देखा कि लोग पुराने कपड़े देना चाहते हैं लेकिन उन्हें आसान तरीका नहीं मिलता।
यहीं से NoKasa का विचार बना।
NoKasa कैसे काम करता है?
NoKasa ने शुरुआत में आवासीय सोसाइटियों में स्मार्ट कलेक्शन बिन लगाए। बाद में मॉडल को बढ़ाकर घर से कपड़े उठाने की सुविधा तक ले जाया गया।

इस प्रक्रिया में:
लोग कपड़े देने के लिए स्लॉट बुक करते हैं।
टीम कपड़े इकट्ठा करती है।
कपड़ों की गुणवत्ता के अनुसार उनकी छंटाई होती है।
उपयोग योग्य कपड़े दोबारा बाजार में जाते हैं।
बाकी कपड़ों को रिसाइकिल या अपसाइकिल किया जाता है।

कुछ मामलों में उपयोगकर्ताओं को कपड़ों के बदले कैशबैक या भुगतान भी दिया गया।

क्या सच में कोई सकारात्मक बदलाव आया?
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
अब तक उपलब्ध सार्वजनिक दावों के अनुसार:
कंपनी ने 30 से अधिक कलेक्शन ड्राइव आयोजित कीं।
कंपनी ने 3 टन से अधिक टेक्सटाइल वेस्ट को लैंडफिल में जाने से रोका होने का दावा किया।
बाद की रिपोर्टों में बताया गया कि मई 2025 के बाद से 20 टन से अधिक कपड़े (लगभग 60–70 हजार वस्त्र) इकट्ठा किए गए।
इनमें से लगभग 15 टन कपड़ों को दोबारा उपयोग में लाया गया और बाकी को रिसाइकिल या अपसाइकिल किया गया।

हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आंकड़े कंपनी और मीडिया रिपोर्टों में बताए गए हैं। इनके लिए स्वतंत्र सरकारी सत्यापन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं दिखा। इसलिए इन्हें कंपनी द्वारा साझा प्रभाव आँकड़े माना जाना चाहिए।

यह मॉडल क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?
भारत हर साल लाखों टन टेक्सटाइल वेस्ट पैदा करता है और उसका बड़ा हिस्सा सही तरीके से प्रोसेस नहीं हो पाता। सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल का विचार यही है कि किसी वस्तु का जीवनचक्र बढ़ाया जाए और उसे जल्द कचरा बनने से रोका जाए।

अगर ऐसे मॉडल बड़े स्तर पर सफल होते हैं, तो:
लैंडफिल का दबाव कम हो सकता है,
नए कपड़ों के उत्पादन पर संसाधनों की मांग घट सकती है,
पानी और ऊर्जा की बचत हो सकती है,
और सेकेंड-हैंड व रिसाइकिल बाजार मजबूत हो सकता है।

आगे की योजना
रिपोर्ट्स के अनुसार NoKasa भविष्य में कपड़ों की सफाई, मरम्मत, री-डाइंग और थ्रिफ्ट आधारित ऑनलाइन बिक्री जैसे मॉडल पर भी काम करने की योजना बना रही है।

निष्कर्ष
NoKasa अभी बहुत पुरानी कंपनी नहीं है — इसकी शुरुआत 2024 में हुई। लेकिन जिस समस्या पर यह काम कर रही है, वह वास्तविक है: पुराने कपड़ों का बढ़ता कचरा। अभी यह कहना जल्दी होगा कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा बदलाव आ गया है, लेकिन शुरुआती स्तर पर इसने टेक्सटाइल वेस्ट को व्यवस्थित तरीके से संभालने की दिशा में ध्यान जरूर खींचा है।


फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि यह पहल वास्तविक है, कंपनी मौजूद है, और शुरुआती स्तर पर कुछ मापनीय प्रभाव के दावे सामने आए हैं — लेकिन दीर्घकालिक असर समय के साथ अधिक स्पष्ट होगा।

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