सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 4 नवंबर 2026
मुंबई में सार्वजनिक बस स्टैंड की जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने नगर निगम आयुक्त अश्विनी भिड़े को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। साथ ही उनके और संबंधित निजी कर्मचारियों के वेतन के भुगतान पर रोक लगाने का निर्देश दिया है।
यह मामला केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए आदेशों का पालन नहीं करने का है। अदालत ने BMC को अतिरिक्त समय देने से भी इनकार कर दिया।
क्या है मामला?
यह विवाद मुंबई के बोरीवली इलाके में BEST (बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट) बस स्टैंड के लिए निर्धारित जमीन से जुड़ा है। इस जमीन पर लंबे समय से अतिक्रमण और कानूनी विवाद चल रहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त 2025 को इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया था। अदालत ने निजी डेवलपर को लगभग 3,400 वर्ग मीटर जमीन और उससे जुड़ी प्रशासनिक इमारत का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा BMC को सौंपने का निर्देश दिया था।
इसके साथ ही नगर निगम को बस स्टैंड से संबंधित बाकी काम पूरा करके उसे चालू करने और जमीन पर मौजूद अवैध कब्जों को कानून के अनुसार हटाने के लिए कहा गया था।
पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी नाराजगी
13 नवंबर 2025 को जब मामला दोबारा अदालत में पहुंचा, तब सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने में हो रही देरी पर सवाल उठाए थे।
अदालत ने नगर निगम आयुक्त से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा था। इसमें जमीन पर मौजूद लोगों की जानकारी, उन्हें दिए गए नोटिस, उनके जवाब और जमीन पर किरायेदारी या मालिकाना हक के दावों से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी देने को कहा गया था।
इसके बाद 28 जुलाई 2026 को अदालत ने फिर निर्देश दिया कि BMC तीन महीने के भीतर जरूरी कार्रवाई पूरी करे और अनुपालन रिपोर्ट पेश करे।
लेकिन निर्धारित समय में कार्रवाई पूरी नहीं होने पर मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।
3 नवंबर 2026 को अदालत में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की। इसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
BMC की ओर से अदालत में कहा गया कि अधिकारियों ने अतिक्रमण करने वालों को नोटिस दिए हैं और उनकी सुनवाई भी की गई है। कुछ लोगों ने किरायेदारी और मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज पेश किए हैं। इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए नगर निगम ने 30 दिन का अतिरिक्त समय मांगा था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग खारिज कर दी।
अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि मराठी भाषा में मौजूद दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद कराने में इतना समय क्यों लग रहा है, जबकि संबंधित अधिकारी मराठी भाषा जानते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने अधिकारियों के कामकाज पर गंभीर नाराजगी जताई और आशंका व्यक्त की कि कहीं अधिकारी अतिक्रमण करने वालों के साथ मिलीभगत तो नहीं कर रहे हैं। हालांकि, यह अदालत की आशंका और टिप्पणी थी, किसी मिलीभगत का अंतिम रूप से साबित होना नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या आदेश दिए?
कमिश्नर को नोटिस: BMC आयुक्त अश्विनी भिड़े से पूछा गया कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
वेतन पर रोक: आयुक्त और उनके निजी कर्मचारियों का वेतन जारी नहीं करने का निर्देश दिया गया। सुनवाई में 1 दिसंबर 2026 तक अनुपालन करने की बात भी कही गई।
₹5 लाख का जुर्माना: BMC की अतिरिक्त समय मांगने वाली याचिका खारिज करते हुए उस पर पांच लाख रुपये का खर्च लगाया गया।
अतिरिक्त समय देने से इनकार: अदालत ने 30 दिन की और मोहलत देने से मना कर दिया।
क्या कमिश्नर को दोषी घोषित कर दिया गया है?
यहां एक जरूरी कानूनी बात समझना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कमिश्नर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसका मतलब है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। अभी इसे अंतिम सजा या अवमानना के मामले में अंतिम दोषसिद्धि नहीं समझना चाहिए।
अदालत ने प्रथम दृष्टया आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की आशंका जताई है और आगे की कार्रवाई के लिए जवाब मांगा है।
इस फैसले का आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
इस मामले का सीधा संबंध मुंबई की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से है। BEST बस स्टैंड के लिए निर्धारित जमीन का इस्तेमाल समय पर शुरू नहीं हो पाने से सार्वजनिक सुविधा प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई से नगर निगम और अन्य सरकारी अधिकारियों को यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि अदालत के समयबद्ध आदेशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हटाने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन की है और उसे कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी।
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