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सावधान नेशन न्यूज़

🥗 पैकेट वाले खाने पर फिर बड़ा सवाल: क्या Ultra-Processed Food सच में धमनियों के लिए खतरा बढ़ा रहा है?

सावधान नेशन न्यूज़

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026

नई रिसर्च ने फिर बढ़ाई चिंता, लेकिन “हर पैकेट वाला खाना जहर है” कहना गलत होगा
पिछले कुछ वर्षों में Ultra-Processed Food यानी UPF को लेकर दुनिया भर में वैज्ञानिक बहस तेज हुई है। अब सितंबर 2026 में प्रकाशित एक बड़ी prospective cohort study ने इस बहस में एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा जोड़ा है। UK Biobank के 1,33,797 लोगों के डेटा का विश्लेषण करने वाली इस रिसर्च में ज्यादा UPF सेवन और बाद में atherosclerosis यानी धमनियों में प्लाक जमने के बीच संबंध पाया गया।

लेकिन यहां सबसे जरूरी बात यह है—यह रिसर्च यह साबित नहीं करती कि Ultra-Processed Food अकेले atherosclerosis का कारण है। यह एक observational cohort study है। यानी शोधकर्ताओं ने लोगों के खान-पान और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध देखा है; इससे सीधे कारण और परिणाम साबित नहीं होता।


रिसर्च में वास्तव में क्या मिला?
10 सितंबर 2026 को Frontiers in Nutrition में प्रकाशित इस अध्ययन में शुरुआत में atherosclerosis से मुक्त UK Biobank प्रतिभागियों को शामिल किया गया। अंतिम विश्लेषण में 133,797 लोग थे और उनका औसत follow-up लगभग 10.9 साल रहा। इस दौरान 654 नए clinically coded atherosclerosis cases दर्ज हुए।

जब सबसे ज्यादा UPF खाने वाले समूह की तुलना सबसे कम सेवन वाले समूह से की गई, तो servings/day के आधार पर atherosclerosis का hazard ratio 1.40 था—यानी लगभग 40% अधिक relative risk। ग्राम/दिन के आधार पर यह संबंध लगभग 29% अधिक risk का था।

यहां “40% अधिक जोखिम” का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को 40% संभावना से बीमारी हो जाएगी। यह दोनों समूहों के बीच relative association है।

🍟आखिर Ultra-Processed Food होता क्या है?
यह समझना बहुत जरूरी है कि processed और ultra-processed एक ही चीज नहीं हैं।
दूध को pasteurize करना, सब्जियां काटना, दाल को पैकेट में रखना, frozen vegetables या canned beans—ये processing के उदाहरण हो सकते हैं। हर processed food अस्वास्थ्यकर नहीं होता। American Heart Association भी इस बात पर जोर देता है कि कुछ processed foods स्वस्थ भोजन का हिस्सा हो सकते हैं।


Ultra-processed foods में आम तौर पर ऐसे औद्योगिक formulations आते हैं जिनमें कई ingredients, additives, flavourings, sweeteners, emulsifiers आदि का इस्तेमाल होता है। उदाहरणों में कुछ sugary drinks, packaged snacks, chips, cookies, confectionery, कुछ ready-to-eat meals और processed meats शामिल हो सकते हैं।

लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण सावधानी है: हर UPF का स्वास्थ्य प्रभाव समान नहीं माना जा सकता। बड़ी prospective studies में अलग-अलग UPF categories के संबंध अलग पाए गए हैं। उदाहरण के लिए sugar-sweetened beverages और processed meat लगातार ज्यादा चिंता वाले समूहों में दिखाई देते हैं, जबकि कुछ whole-grain breads या कम sugar वाले yogurt जैसे products का nutritional profile अलग हो सकता है।

इसलिए केवल पैकेट देखकर फैसला करना सही तरीका नहीं है।
❤️ क्या UPF और heart disease का संबंध सिर्फ इसी नई रिसर्च में मिला है?
नहीं।
2024 में The Lancet Regional Health – Americas में प्रकाशित तीन बड़े US cohorts और 22 prospective studies के meta-analysis में सबसे ज्यादा UPF सेवन वाले लोगों में cardiovascular disease और coronary heart disease का जोखिम ज्यादा पाया गया था। कुल UPF के लिए pooled analysis में cardiovascular disease का risk लगभग 17% ज्यादा था।

मार्च 2026 में American College of Cardiology ने MESA study के परिणामों की जानकारी दी, जिसमें ज्यादा UPF consumption और major cardiovascular events के बीच association पाया गया।

लेकिन वैज्ञानिक तस्वीर अभी भी पूरी तरह सरल नहीं है। NIH ने भी बताया है कि observational studies बढ़ रही हैं, लेकिन लंबे और बड़े randomized clinical trials अभी सीमित हैं। इसलिए वैज्ञानिकों के बीच यह सवाल अभी खुला है कि नुकसान का कितना हिस्सा food processing से और कितना ज्यादा calories, sugar, salt, saturated fat, कम fibre, ज्यादा खाने की प्रवृत्ति और overall lifestyle से आता है।

NFHS-6 ने भारत के लिए दूसरी बड़ी चेतावनी क्यों दी?
भारत की स्थिति और भी जटिल है।
NFHS-6 2023-24 के अनुसार 15–49 वर्ष की महिलाओं में overweight या obesity का अनुपात 24% से बढ़कर 30.7% हो गया। पुरुषों में यह 22.9% से बढ़कर 27.3% हुआ।

लेकिन उसी समय कम BMI की समस्या भी खत्म नहीं हुई। महिलाओं में BMI 18.5 से कम वाले लोगों का अनुपात 18.7% से बढ़कर 19.7% हुआ, जबकि पुरुषों में यह 16.2% से बढ़कर 19.7% पहुंचा।

इसका अर्थ है कि भारत को एक साथ undernutrition और overnutrition दोनों से जूझना पड़ रहा है।
यह सिर्फ मोटापे की कहानी नहीं है। NFHS-6 में 15 वर्ष से ऊपर के लोगों में high/very-high blood sugar या diabetes की दवा लेने वालों का अनुपात भी महिलाओं में 13.5% से 17.8% और पुरुषों में 15.6% से 20.9% हुआ।

इसलिए भारत के लिए चुनौती यह है कि “कम खाओ” कहना पर्याप्त नहीं है। सही पोषण, पर्याप्त पोषण और बेहतर भोजन—तीनों जरूरी हैं।


🇮🇳 भारत सरकार क्या कर रही है?
भारत में कार्रवाई पूरी तरह शून्य नहीं है।
FSSAI का Eat Right India अभियान सुरक्षित, स्वस्थ और टिकाऊ भोजन को बढ़ावा देने के लिए चलाया जा रहा है। इसके तहत Eat Right School, Eat Right Campus और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

स्कूलों के लिए HFSS यानी High Fat, Salt and Sugar foods को सीमित करने की व्यवस्था भी पहले से मौजूद है। FSSAI के नियमों के तहत स्कूलों और उनके आसपास बच्चों को ऐसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता/मार्केटिंग पर प्रतिबंधों का प्रावधान किया गया है।

और 2026 में सरकार की ओर से आगे की regulatory action भी दिखाई दे रही है। FSSAI ने अगस्त 2026 में school-food regulations में added fat, added sugar और salt में high foods की definitions जोड़ने वाला draft amendment जारी किया।

इसके अलावा FSSAI ने packaged foods और beverages में ज्यादा sugar, salt या saturated fat वाले products के लिए front-of-pack warning labels का प्रस्ताव रखा है। रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित labels में “HIGH SUGAR”, “HIGH SALT” और “HIGH FAT” जैसी चेतावनियां शामिल हैं। यह अभी प्रस्ताव/नियामकीय प्रक्रिया का हिस्सा है, इसे पूर्ण रूप से लागू हो चुका नियम नहीं समझना चाहिए।

दूसरे देशों ने क्या किया है?
भारत अकेला देश नहीं है जो packaged food के nutrition information को सामने लाने की कोशिश कर रहा है।
Chile ने 2016 में front-of-package warning labels की व्यवस्था शुरू की थी। इसके बाद Peru, Uruguay, Mexico, Argentina, Colombia, Brazil और Ecuador सहित कई देशों ने अलग-अलग रूपों में front-of-pack warning systems अपनाए हैं।

इनमें अक्सर काले या अन्य स्पष्ट warning symbols के माध्यम से बताया जाता है कि किसी product में अधिक sugar, sodium या saturated fat है।
कुछ देशों ने इसके साथ दूसरी नीतियां भी अपनाई हैं। उदाहरण के लिए Chile में unhealthy foods की marketing और schools में बिक्री पर restrictions हैं। Mexico और Colombia में कुछ unhealthy food/beverage taxes भी लागू हैं। Brazil ने school feeding policy में minimally processed और whole foods की हिस्सेदारी बढ़ाने पर काम किया है।

PAHO की 2026 की समीक्षा के मुताबिक Americas में Argentina, Chile, Colombia, Mexico, Peru, Uruguay, Brazil और Ecuador ने front-of-package labeling systems अपनाए हैं।

लेकिन किसी policy को देखकर यह कहना भी सही नहीं होगा कि उससे हर देश में obesity या heart disease निश्चित रूप से कम हो गई। नीतियों के प्रभाव को अलग-अलग परिस्थितियों में लगातार evaluate किया जा रहा है।

हमें अपनी थाली में क्या बदलाव करने चाहिए?
सबसे व्यावहारिक रास्ता पैकेट का पूर्ण बहिष्कार नहीं, बल्कि रोजमर्रा के भोजन का संतुलन बदलना है।
बेहतर विकल्प
चिप्स/फ्राइड पैकेज्ड स्नैक → भुना चना, मूंगफली, मखाना, फल
मीठा soft drink → पानी, नींबू पानी कम/बिना चीनी, छाछ
मीठा packaged cereal → दलिया, oats, पोहा या उपमा
processed meat → दाल, चना, राजमा, अंडा या ताजा मांस/मछली
packaged मिठाई/बिस्कुट → फल, दही, सीमित मात्रा में घर का बना snack
ready-to-eat meal → घर की दाल, सब्जी, रोटी/चावल और सलाद
और सबसे महत्वपूर्ण—लेबल पढ़ना शुरू करें। सिर्फ “healthy”, “multigrain”, “high protein”, “sugar-free” जैसे शब्दों पर भरोसा न करें। Ingredients और nutrition panel देखें।


⚠️ अंतिम बात: डर नहीं, समझदारी जरूरी है
नई 1.33 लाख से ज्यादा लोगों वाली UK Biobank study को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि इसमें बड़ा sample और लंबे समय का follow-up है। लेकिन इसे यह कहने के लिए इस्तेमाल करना सही नहीं होगा कि “पैकेट का खाना खाते ही धमनियों में plaque जम जाएगा।”
आज उपलब्ध evidence से ज्यादा मजबूत संदेश यह निकलता है कि बहुत ज्यादा UPF वाला dietary pattern cardiovascular health के लिए चिंता का विषय है, खासकर जब उसमें sugary drinks, processed meats, ज्यादा salt, added sugar और unhealthy fats की मात्रा अधिक हो।

भारत में NFHS-6 की तस्वीर इस चिंता को और महत्वपूर्ण बनाती है—एक तरफ 30.7% महिलाएं और 27.3% पुरुष 15–49 वर्ष की उम्र में overweight/obese हैं, तो दूसरी तरफ कम BMI की समस्या भी बनी हुई है।

इसलिए समाधान सिर्फ “जंक फूड बंद करो” नहीं है। समाधान है—ताजा और कम-प्रोसेस्ड भोजन को रोज की थाली का आधार बनाना, packaged foods को समझदारी से चुनना, मीठे पेय और अत्यधिक processed foods को कम करना, पर्याप्त physical activity रखना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से नियमित health checks कराना।
**यानी पैकेट को दुश्मन मानने की जरूरत नहीं—लेकिन पैकेट को रोज की थाली का आधार बनाना भी समझदारी नहीं है।**

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