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सावधान नेशन न्यूज़

कैंसर की दवाओं पर बड़ी राहत: कीमतों में 93% तक की कटौती, अस्पतालों के भारी मुनाफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2026

भारत में कैंसर का इलाज लंबे समय से आम परिवारों के लिए आर्थिक चुनौती बना हुआ है। महंगी दवाइयों और अस्पतालों में दवाओं की कीमतों पर भारी अंतर को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने सवाल उठाया है कि जब किसी दवा को अस्पताल या वितरक कम कीमत पर खरीद सकता है, तो मरीजों से उसके लिए कई गुना अधिक पैसे क्यों वसूले जाते हैं? इसी बीच केंद्र सरकार के दवा मूल्य नियंत्रण से जुड़े फैसले के बाद कैंसर की कई दवाओं की कीमतों में 93 प्रतिशत तक की कमी सामने आई है। हालांकि, इस राहत का लाभ सभी कैंसर मरीजों को एक समान नहीं मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों के मुनाफे पर क्या कहा?
27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दवाओं की कीमतों और निजी अस्पतालों द्वारा लगाए जाने वाले भारी मुनाफे से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर पर नाराजगी जताई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक कैंसर मरीज का उदाहरण दिया। बताया गया कि एक दवा वितरक अपनी पत्नी के इलाज के लिए कीमोथेरेपी का इंजेक्शन लगभग 11 हजार रुपये में उपलब्ध करा सकता था, लेकिन निजी अस्पताल ने उसी इंजेक्शन के लिए करीब 1.30 लाख रुपये मांगे।
इस पर अदालत ने सवाल किया कि आखिर दवा की कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों है और इसका फायदा किसे मिल रहा है?
अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्पताल अपनी सुविधाओं और सेवाओं के लिए उचित शुल्क ले सकते हैं, लेकिन जीवन बचाने वाली दवाओं पर कई गुना कीमत वसूलने को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मरीजों की जिंदगी से जुड़े मामले को केवल व्यापार और मुनाफे के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।

कैंसर की 137 दवाओं पर सरकार का बड़ा फैसला
कैंसर की दवाओं को सस्ता बनाने के लिए केंद्र सरकार ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा 30 प्रतिशत निर्धारित की है।
यह फैसला राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के माध्यम से लागू किया गया है।
ट्रेड मार्जिन का मतलब है कि दवा निर्माता से दवा खरीदने के बाद वितरक, थोक विक्रेता और अन्य बीच के कारोबारी उसकी कीमत में कितना अतिरिक्त मार्जिन जोड़ सकते हैं।
सरकार का उद्देश्य इस अतिरिक्त मुनाफे पर नियंत्रण लगाना और मरीजों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराना है।
सरकार के अनुमान के मुताबिक, इस कदम से कैंसर मरीजों को हर साल लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।

किन दवाओं की कीमतों में 93 प्रतिशत तक की कमी आई?
NPPA की 28 अक्टूबर को जारी संशोधित कीमतों की जानकारी के अनुसार, कई जेनेरिक और बायोसिमिलर कैंसर दवाओं के दाम में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:
दवा का नाम पुरानी कीमत नई कीमत
Palbopro (125 mg) ₹40,421 ₹2,720
Abiralive (250 mg) ₹28,000 ₹4,840
Womazol (10 टैबलेट) ₹458.85 ₹39.52
Ivzumab (400 mg) ₹69,852 ₹13,512
इनमें Palbopro की कीमत में लगभग 93 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं Abiralive और Ivzumab जैसी दवाएं भी काफी सस्ती हुई हैं।
ये कीमतें संबंधित ब्रांड और पैक के लिए हैं। एक ही दवा के दूसरे ब्रांड की कीमत अलग हो सकती है।

क्या सभी कैंसर की दवाएं सस्ती हो गई हैं?
इस फैसले के बावजूद कैंसर मरीजों के सामने एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, 65 महंगी कैंसर दवाओं की कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं हुआ है। इनमें कुछ ऐसी दवाएं भी शामिल हैं जिनका उत्पादन या आपूर्ति सीमित कंपनियों द्वारा किया जाता है।
उदाहरण के लिए:
Keytruda (Pembrolizumab) की 100 mg शीशी की सूचीबद्ध कीमत लगभग 2,16,500 रुपये बनी हुई है।
Tagrisso जैसी महंगी दवा की कीमत में भी इस संशोधन से राहत नहीं मिली है।
इसका मुख्य कारण यह है कि ट्रेड मार्जिन पर सीमा लगाने से दवा की शुरुआती निर्माता कीमत अपने आप कम नहीं होती। जहां दवा बनाने वाली कंपनी की कीमत ही बहुत अधिक है और प्रतिस्पर्धा कम है, वहां मरीजों को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाती।

9 नवंबर से लागू होंगी नई कीमतें
NPPA द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी। इसका मतलब है कि मरीजों को नई दरों का लाभ निर्धारित तारीख से मिलना शुरू होगा।
इस व्यवस्था में अस्पतालों को भी निर्धारित ट्रेड मार्जिन के नियमों का पालन करना होगा। दवाओं की खरीद और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमतों में पारदर्शिता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।


सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और अस्पतालों से क्या अपेक्षा जताई?
सुप्रीम कोर्ट ने केवल कैंसर की दवाओं तक ही नहीं, बल्कि दूसरी आवश्यक दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों पर भी सवाल उठाए।
अदालत ने उदाहरण देते हुए बताया कि जिस सलाइन ड्रिप लाइन की खुदरा कीमत लगभग 15 रुपये है, उसके लिए मरीज से करीब 250 रुपये वसूले जा रहे थे।
निजी अस्पतालों की ओर से दलील दी गई कि अस्पतालों को 24 घंटे सुविधाएं उपलब्ध कराने, कर्मचारियों और चिकित्सा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए खर्च करना पड़ता है। लेकिन अदालत ने कहा कि अस्पताल अपनी दूसरी सेवाओं के माध्यम से भी खर्च की भरपाई कर सकते हैं। मरीजों पर दवाओं के नाम पर अनुचित आर्थिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यानी अभी अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है।


कैंसर मरीजों के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह फैसला?
भारत में कैंसर का इलाज केवल बीमारी से लड़ने की चुनौती नहीं है, बल्कि कई परिवारों के लिए आर्थिक संघर्ष भी बन जाता है। लंबे समय तक चलने वाला इलाज, महंगी दवाएं और अस्पतालों का खर्च परिवारों की बचत तक खत्म कर सकता है।
ऐसे में कैंसर की कुछ दवाओं की कीमतों में 93 प्रतिशत तक की कटौती निश्चित रूप से राहत देने वाला कदम है। लेकिन यह भी जरूरी है कि सभी जरूरी दवाओं की कीमतों पर पारदर्शी व्यवस्था बने और मरीजों को सही कीमत पर दवाएं उपलब्ध हों।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 93 प्रतिशत तक की कटौती सभी कैंसर दवाओं पर नहीं हुई है। यह राहत कुछ विशेष जेनेरिक और बायोसिमिलर ब्रांडों तक सीमित है। इसलिए मरीजों को दवा खरीदते समय उसके ब्रांड, मात्रा और संशोधित MRP की जांच जरूर करनी चाहिए।

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