सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2026
नई तकनीक से भविष्य में स्वच्छ और लगातार बिजली उत्पादन का रास्ता हो सकता है आसान।
दुनिया भर के वैज्ञानिक लंबे समय से परमाणु संलयन (Nuclear Fusion) के जरिए बिजली उत्पादन को व्यावहारिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी दिशा में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने पहली बार प्रयोग के माध्यम से यह प्रदर्शित किया है कि रेडियो तरंगों की मदद से टोकामक रिएक्टर के अंदर मौजूद अत्यधिक गर्म प्लाज्मा में विद्युत धारा पैदा की जा सकती है। इस तकनीक को हेलिकॉन करंट ड्राइव (Helicon Current Drive) कहा जाता है।
इस सफलता को भविष्य के ऐसे परमाणु संलयन बिजली संयंत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें लंबे समय तक लगातार चलाने की जरूरत होगी। हालांकि, यह अभी बिजली उत्पादन की व्यावसायिक सफलता नहीं है, बल्कि एक अहम वैज्ञानिक प्रयोग है।
क्या है यह नई तकनीक और कैसे काम करती है?
टोकामक एक विशेष प्रकार का परमाणु संलयन रिएक्टर होता है, जिसका आकार डोनट यानी गोल छल्ले जैसा होता है। इसके अंदर हाइड्रोजन के विशेष ईंधन को अत्यधिक गर्म करके प्लाज्मा बनाया जाता है। इस प्लाज्मा को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से नियंत्रित रखा जाता है, ताकि परमाणु संलयन की प्रक्रिया हो सके।
इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्लाज्मा के अंदर विद्युत धारा बनाए रखना है। अभी तक कई टोकामक रिएक्टरों में इसके लिए ट्रांसफॉर्मर आधारित व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन इस व्यवस्था की एक सीमा है। इसमें विद्युत धारा लगातार अनिश्चित समय तक नहीं चलाई जा सकती, क्योंकि ट्रांसफॉर्मर को समय-समय पर अपना चक्र पूरा करना पड़ता है।
नई हेलिकॉन करंट ड्राइव तकनीक इसी चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में एक कदम है। इसमें विशेष रेडियो तरंगों को प्लाज्मा के भीतर पहुंचाया जाता है। ये तरंगें प्लाज्मा के कणों के साथ ऊर्जा का आदान-प्रदान करती हैं और उसके अंदर विद्युत धारा पैदा करने में मदद करती हैं।
इससे भविष्य में टोकामक रिएक्टरों को बिना बार-बार बंद किए लंबे समय तक चलाने की संभावना बन सकती है।
अमेरिका के वैज्ञानिकों ने कैसे हासिल की सफलता?
यह प्रयोग अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित जनरल एटॉमिक्स के DIII-D नेशनल फ्यूजन फैसिलिटी में किया गया। शोधकर्ताओं ने आधुनिक टोकामक तकनीक और विशेष एंटीना व्यवस्था का इस्तेमाल करके रेडियो तरंगों के माध्यम से प्लाज्मा में करंट पैदा करने का प्रदर्शन किया।
इस शोध का नेतृत्व वैज्ञानिक जेफ लेस्ट्ज (Jeff Lestz) की टीम ने किया। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Physical Review Letters में प्रकाशित हुए हैं।
खास बात यह है कि हेलिकॉन करंट ड्राइव पर वैज्ञानिक 1980 के दशक से काम कर रहे थे, लेकिन उस समय उपलब्ध तकनीक और प्रयोगात्मक परिस्थितियों में इसे सफलतापूर्वक साबित नहीं किया जा सका था। अब पहली बार इसके प्रभाव को प्रयोग के माध्यम से स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया है।
भविष्य में बिजली उत्पादन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?
परमाणु संलयन को भविष्य के ऊर्जा स्रोतों में काफी संभावनाओं वाला माना जाता है। इसमें सूर्य के अंदर होने वाली प्रक्रिया की तरह हल्के परमाणुओं के नाभिक आपस में जुड़ते हैं और बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है।
यदि वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को सुरक्षित, नियंत्रित और आर्थिक रूप से व्यावहारिक बना पाते हैं, तो इससे भविष्य में कम कार्बन उत्सर्जन वाली बिजली प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
हेलिकॉन करंट ड्राइव तकनीक के सफल विकास से ऐसे रिएक्टरों को लगातार चलाने में मदद मिल सकती है। इससे बिजली संयंत्रों की कार्यक्षमता और आर्थिक उपयोगिता बेहतर बनाने की संभावना भी है।
अभी किन चुनौतियों को पार करना बाकी है?
इस वैज्ञानिक उपलब्धि के बावजूद परमाणु संलयन से व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन का लक्ष्य अभी दूर है। इसके लिए वैज्ञानिकों को कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान करना होगा।
लंबे समय तक प्लाज्मा को स्थिर बनाए रखना।
करंट ड्राइव तकनीक की दक्षता बढ़ाना।
रिएक्टर को चलाने में खर्च होने वाली ऊर्जा कम करना।
अत्यधिक तापमान और विकिरण सहने वाली सामग्री विकसित करना।
पूरे बिजली संयंत्र को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाना।
इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि इस नई तकनीक से बिजली उत्पादन शुरू हो गया है या बिजली सस्ती हो जाएगी।
निष्कर्ष
अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा हेलिकॉन करंट ड्राइव का सफल प्रयोग परमाणु संलयन अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह तकनीक भविष्य में ऐसे टोकामक रिएक्टर विकसित करने में मदद कर सकती है, जो लंबे समय तक लगातार काम कर सकें।
हालांकि, प्रयोगशाला में मिली सफलता को वास्तविक बिजली उत्पादन तक पहुंचाने के लिए अभी और शोध, परीक्षण और तकनीकी विकास की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैज्ञानिक इस तकनीक को कितनी दक्षता के साथ बड़े रिएक्टरों में इस्तेमाल कर पाते हैं।
सावधान नेशन न्यूज़…