सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 4 जून 2026
जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह जल्द से जल्द जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने पर निर्णय ले। यह मुद्दा पिछले कुछ वर्षों से लगातार राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
गौरतलब है कि अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए से जुड़े प्रावधानों को समाप्त करते हुए तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन किया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। उस समय केंद्र सरकार ने कहा था कि परिस्थितियां सामान्य होने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत होने के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने पर विचार किया जाएगा।
हाल के महीनों में जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हैं। विधानसभा चुनावों और नई सरकार के गठन के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को नए सिरे से बल मिला है। कई क्षेत्रीय दलों का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए राज्य का दर्जा आवश्यक है। उनका तर्क है कि राज्य का दर्जा मिलने से प्रशासनिक निर्णयों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका और अधिक मजबूत होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य का दर्जा केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं बल्कि जनता की भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। जम्मू-कश्मीर के कई नेताओं का कहना है कि पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने से विकास योजनाओं के क्रियान्वयन, प्रशासनिक जवाबदेही और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में सुधार होगा। इसके अलावा स्थानीय सरकार को कई महत्वपूर्ण विषयों पर अधिक अधिकार प्राप्त होंगे।
हाल ही में विभिन्न राजनीतिक मंचों पर भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है। विपक्षी दलों ने संसद और अन्य राजनीतिक कार्यक्रमों में केंद्र सरकार से इस संबंध में स्पष्ट समयसीमा बताने की मांग की है। उनका कहना है कि जब जम्मू-कश्मीर में चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और निर्वाचित सरकार कार्य कर रही है, तब राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
दूसरी ओर केंद्र सरकार का रुख यह रहा है कि जम्मू-कश्मीर में शांति, सुरक्षा और विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार का कहना है कि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे, पर्यटन, निवेश और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं लागू की गई हैं। केंद्र ने पहले भी संसद में संकेत दिया है कि उचित समय आने पर राज्य का दर्जा बहाल किया जा सकता है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य का दर्जा बहाल करने से पहले केंद्र सरकार क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और प्रशासनिक तैयारियों का व्यापक मूल्यांकन कर सकती है। पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं और सरकार इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आगे का निर्णय ले सकती है।
इस बीच जम्मू-कश्मीर के युवाओं, व्यापारिक संगठनों और नागरिक समाज के कुछ वर्गों ने भी राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग का समर्थन किया है। उनका मानना है कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अधिक मजबूत होगी तथा क्षेत्र के विकास को नई गति मिल सकती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि राज्य का दर्जा बहाल होने के बाद भी विकास और सुशासन के लिए प्रभावी नीतियों का निरंतर क्रियान्वयन आवश्यक रहेगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार आने वाले समय में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण बना रह सकता है। संसद के आगामी सत्रों और केंद्र-राज्य संबंधों पर होने वाली चर्चाओं में जम्मू-कश्मीर की राज्य की मांग प्रमुख विषय बन सकती है। यदि केंद्र सरकार इस दिशा में कोई बड़ा निर्णय लेती है, तो उसका प्रभाव केवल जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों की नजर अब केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है। आने वाले महीनों में इस मुद्दे पर होने वाले राजनीतिक और संवैधानिक घटनाक्रम देशभर का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।
निष्कर्ष
जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने की मांग अब केवल राजनीतिक नारा नहीं रह गई है, बल्कि यह क्षेत्र के प्रशासनिक ढांचे, लोकतांत्रिक अधिकारों और विकास की दिशा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। केंद्र सरकार के अगले निर्णय पर पूरे देश की नजर बनी हुई है, क्योंकि इससे जम्मू-कश्मीर के भविष्य की दिशा तय होने की संभावना है।
सावधान नेशन न्यूज़…