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सावधान नेशन न्यूज़

निर्जला एकादशी पर मथुरा से द्वारका तक दिखी आस्था की लहर, तीर्थों में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

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नई दिल्ली, 25 जून 2026

निर्जला एकादशी का महत्व
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे कठिन और पुण्यदायी व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की आराधना करने से भक्तों को विशेष फल प्राप्त होता है।
निर्जला एकादशी को लेकर देशभर के मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर विशेष पूजा, भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दिन भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा की गई। श्रीकृष्ण से जुड़े प्रमुख तीर्थों मथुरा, वृंदावन और द्वारका में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली।


मथुरा-वृंदावन में कृष्ण भक्ति का विशेष माहौल
भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में निर्जला एकादशी पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें मंदिरों में देखने को मिलीं। भक्तों ने यमुना स्नान कर भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की और व्रत का संकल्प लिया।
श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में विशेष पूजा और दर्शन की व्यवस्था की गई। मंदिर परिसर में भक्ति गीतों और मंत्रोच्चारण का वातावरण बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान कृष्ण के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।


वहीं वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में भी निर्जला एकादशी पर विशेष श्रृंगार और आरती हुई। बांके बिहारी मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ी। भगवान बांके बिहारी के दर्शन के लिए देश के कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे।
कई जगहों पर भक्तों ने जल सेवा और प्रसाद वितरण भी किया। हालांकि निर्जला व्रत में भक्त स्वयं जल ग्रहण नहीं करते, लेकिन धार्मिक परंपरा के अनुसार जरूरतमंदों को जल और भोजन दान करने का महत्व माना जाता है।


द्वारका में भगवान द्वारकाधीश की विशेष पूजा
गुजरात स्थित भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका में भी निर्जला एकादशी का उत्साह देखने को मिला।
द्वारकाधीश मंदिर में भगवान द्वारकाधीश का विशेष श्रृंगार किया गया। सुबह से ही भक्त मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचने लगे। मंदिर में वैदिक मंत्रों के साथ पूजा-अर्चना की गई।


द्वारका में आने वाले श्रद्धालुओं ने गोमती घाट पर स्नान किया और भगवान कृष्ण को समर्पित पूजा की। कई भक्तों ने निर्जला व्रत रखकर भगवान से परिवार की खुशहाली और स्वास्थ्य की प्रार्थना की।
द्वारका का महत्व इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि इसे भगवान श्रीकृष्ण की कर्मभूमि और उनकी नगरी के रूप में देखा जाता है। इसलिए एकादशी जैसे पर्वों पर यहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।


देश के अन्य तीर्थ स्थलों पर भी दिखा उत्साह
निर्जला एकादशी पर केवल मथुरा और द्वारका ही नहीं बल्कि देश के कई बड़े तीर्थों में धार्मिक आयोजन हुए।


श्री जगन्नाथ मंदिर में भी श्रद्धालुओं ने भगवान विष्णु के स्वरूप भगवान जगन्नाथ की पूजा की। मंदिरों में विशेष आरती और धार्मिक कार्यक्रम हुए।


काशी विश्वनाथ मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। लोगों ने गंगा स्नान कर पूजा-पाठ किया।
देश के कई स्थानों पर लोगों ने इस दिन दान-पुण्य किया। मंदिरों के बाहर जल वितरण और सेवा शिविर लगाए गए ताकि गर्मी के मौसम में यात्रियों को सुविधा मिल सके।


निर्जला एकादशी पर क्या करते हैं भक्त?
इस व्रत में कई भक्त सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तक बिना पानी के रहते हैं। कुछ लोग अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार फलाहार या जल ग्रहण करके भी व्रत करते हैं।


धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, कथा सुनना और दान करना शुभ माना जाता है।
निर्जला एकादशी की कथा महाभारत काल से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि भीम ने सभी एकादशियों का व्रत करना कठिन समझकर महर्षि व्यास के सुझाव पर केवल निर्जला एकादशी का व्रत किया था।


आस्था और सेवा का संगम
निर्जला एकादशी पर देशभर में आस्था के साथ सेवा भावना भी दिखाई दी। मंदिरों में दर्शन करने आए भक्तों ने धार्मिक परंपराओं को निभाया, वहीं कई स्थानों पर गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन, पानी और अन्य सामग्री वितरित की गई।


मथुरा की गलियों से लेकर द्वारका के समुद्र तट तक भगवान कृष्ण के नाम की गूंज सुनाई दी। यह पर्व केवल उपवास का नहीं बल्कि श्रद्धा, संयम और सेवा का प्रतीक माना जाता है।

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