सावधान नेशन न्यूज़
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2026
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान वोटरों के नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा किए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आरोपों की जांच करने, जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने और अपनी कार्रवाई की रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है। इस मामले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति और चुनावी प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
दरअसल, उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR कराया जा रहा है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद गलतियों को दूर करना है।
इसी प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटवाने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-7 को लेकर अनियमितताओं की शिकायत सामने आई।
क्या होता है Form-7?
Form-7 एक ऐसा आवेदन है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची से हटाने पर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी मतदाता की मृत्यु हो गई है, वह स्थायी रूप से दूसरी जगह चला गया है या उसका नाम गलत तरीके से एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है, तो निर्धारित नियमों और जांच के आधार पर उसका नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
लेकिन इस फॉर्म का इस्तेमाल किसी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से हटवाने के लिए नहीं किया जा सकता।
एक समुदाय के 32 मतदाताओं को निशाना बनाने का आरोप
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए। उनके वकील ने अदालत को बताया कि उत्तर प्रदेश के एक विधानसभा क्षेत्र में किसी विशेष समुदाय के मतदाताओं के खिलाफ 32 Form-7 आवेदन जमा किए गए थे।
इतना ही नहीं, आरोप लगाया गया कि इन आवेदनों में से दो पर बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के हस्ताक्षर भी मौजूद थे। इस वजह से आवेदन जमा करने की प्रक्रिया और उनकी वास्तविकता पर सवाल उठाए गए।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस तरह के आवेदनों के जरिए कुछ खास मतदाताओं को निशाना बनाने की आशंका है।
हालांकि, ये आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब दिया?
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में Form-7 आवेदन जमा किए गए थे।
लेकिन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि अधिकारियों ने इन आवेदनों की जांच और दोबारा जांच की। जांच में ये आवेदन फर्जी पाए गए और इनके आधार पर किसी भी मतदाता का नाम नहीं हटाया गया।
आयोग का कहना है कि किसी भी मतदाता का नाम बिना नोटिस दिए और संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) की उचित प्रक्रिया पूरी किए बिना मतदाता सूची से नहीं हटाया जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या निर्देश दिए?
30 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे जिन अनियमितताओं को लेकर शिकायत कर रहे हैं, उनका पूरा विवरण चुनाव आयोग के वरिष्ठ वकील को लिखित रूप में सौंपें।
इसके बाद चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया कि वह शिकायतों के तथ्यों की जांच करे, जहां जरूरत हो वहां सुधारात्मक कार्रवाई करे और अपनी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में दाखिल करे।
यह मामला कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और अन्य लोगों की ओर से उत्तर प्रदेश में चल रही SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया।
आम मतदाताओं के लिए इसका क्या मतलब है?
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। किसी भी योग्य नागरिक का नाम केवल गलत शिकायत या फर्जी आवेदन के आधार पर नहीं हटाया जा सकता।
अगर किसी व्यक्ति के नाम को हटाने के लिए Form-7 आवेदन दिया जाता है, तो संबंधित निर्वाचन अधिकारी को उसकी जांच करनी होती है। मतदाता को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया जाता है।
इसलिए मतदाताओं को भी अपनी वोटर लिस्ट में नाम की स्थिति की जांच करते रहना चाहिए और किसी भी तरह की गड़बड़ी दिखाई देने पर निर्वाचन अधिकारियों से शिकायत करनी चाहिए।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मामले की जांच कर आवश्यक सुधार करने और रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग की जांच में किन अनियमितताओं की पुष्टि होती है और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी Form-7 के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने में हुई गड़बड़ी को अंतिम रूप से साबित नहीं किया है। अदालत ने आरोपों की जांच और जरूरी सुधार के निर्देश दिए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि जिन संदिग्ध आवेदनों की जांच की गई, वे फर्जी थे और उनके आधार पर किसी का नाम नहीं हटाया गया।
इस मामले का अंतिम निष्कर्ष चुनाव आयोग की जांच और अदालत में पेश की जाने वाली रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा।
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