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मेरठ में अनोखी पहल: पिता ने ढोल-नगाड़ों से मनाया बेटी के तलाक का जश्न, बोले- ‘बेटियां बोझ नहीं होतीं’ 

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तरुण कश्यप

मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने समाज की रूढ़िवादी सोच को आईना दिखाया है। आमतौर पर जहाँ तलाक को दुख और बदनामी से जोड़कर देखा जाता है, वहीं शास्त्रीनगर निवासी सेवानिवृत्त जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने अपनी इकलौती बेटी प्रणिता वशिष्ठ के तलाक को एक ‘नई शुरुआत’ के रूप में मनाया है। 

ढोल-नगाड़े और ‘I Love My Daughter’ टी-शर्ट
शनिवार को जैसे ही मेरठ फैमिली कोर्ट ने तलाक की कानूनी प्रक्रिया पूरी की, पिता और परिवार के अन्य सदस्यों ने कचहरी परिसर में ही जश्न शुरू कर दिया। पूरा परिवार काली टी-शर्ट पहने नजर आया, जिस पर प्रणिता की फोटो के साथ “I Love My Daughter” लिखा था। कोर्ट से घर तक बेटी का स्वागत फूलों और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हुए किया गया। 

7 साल का संघर्ष और उत्पीड़न
जानकारी के अनुसार, प्रणिता की शादी 19 दिसंबर 2018 को उत्तराखंड कैडर के एक आर्मी मेजर के साथ हुई थी। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। 7 साल तक रिश्ते को बचाने की कोशिश के बाद, जब स्थिति नहीं सुधरी, तो प्रणिता ने अलग होने का फैसला किया। 

पिता का भावुक संदेश
रिटायर्ड जज ज्ञानेंद्र शर्मा ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “अगर मेरी बेटी शादी में खुश नहीं थी, तो उसे सुरक्षित वापस लाना और खुश रखना मेरा फर्ज है। बेटियां बोझ नहीं होतीं और उनका मायका उनके लिए कभी बंद नहीं होना चाहिए”। उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि गलत रिश्ते में घुटने से बेहतर सम्मान के साथ बाहर आना है। 

सोशल मीडिया पर इस अनोखे स्वागत का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है और लोग पिता के इस कदम की जमकर सराहना कर रहे हैं। 

मेरठ के सेवानिवृत्त जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा द्वारा अपनी बेटी प्रणिता के तलाक का जश्न मनाने की इस घटना ने भारतीय समाज की रूढ़िवादी सोच पर गहरा प्रहार किया है। इस खबर से समाज को मिले मुख्य संदेश और इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं: 

1. बेटियों के प्रति नजरिया: ‘बेटी बोझ नहीं, मान है’

  • बेटियां बोझ नहीं: पिता ने ढोल-नगाड़ों और फूलों से स्वागत कर यह संदेश दिया कि बेटी की शादी हो जाने का मतलब यह नहीं कि उसके लिए मायके के दरवाजे बंद हो गए हैं।
  • समान मूल्य: डॉ. शर्मा ने कहा कि जिस तरह बेटी के जन्म पर खुशियां मनाई गई थीं, वैसे ही उसके एक दुखद रिश्ते से बाहर आने पर भी उसका सम्मान जरूरी है क्योंकि उसका मूल्य हर हाल में समान रहता है। 

2. सामाजिक कलंक (Stigma) को चुनौती 

  • तलाक अंत नहीं, नई शुरुआत: समाज में अक्सर तलाक को बदनामी या हार के रूप में देखा जाता है। इस जश्न ने यह स्थापित किया कि तलाक एक गलत रिश्ते से ‘मुक्ति’ और एक बेहतर जीवन की ‘नई शुरुआत’ है।
  • मर्यादा और स्वाभिमान: पिता ने अलुमनी (गुज़ारा भत्ता) लेने से मना कर यह स्पष्ट किया कि उनके लिए बेटी का स्वाभिमान और गरिमा, पैसों या सामाजिक अपेक्षाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। 

3. माता-पिता के लिए मजबूत संदेश 

  • अटूट समर्थन (Unconditional Support): परिवार के सभी सदस्यों द्वारा “I Love My Daughter” लिखी टी-शर्ट पहनना यह दर्शाता है कि कठिन समय में परिवार का साथ ही सबसे बड़ी ताकत है।
  • प्रताड़ना के खिलाफ खड़े होना: खबर यह संदेश देती है कि यदि बेटी ससुराल में मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना सह रही है, तो उसे चुपचाप सहने के लिए मजबूर करने के बजाय उसे सुरक्षित वापस लाना माता-पिता का नैतिक कर्तव्य है। 

4. महिला सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता

  • खुद के लिए बोलना: प्रणिता (जो खुद वित्त निदेशक और मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट हैं) ने अन्य महिलाओं को संदेश दिया कि वे आत्मनिर्भर बनें और शोषण के खिलाफ आवाज उठाएं।
  • गरिमा सर्वोपरि: यह घटना याद दिलाती है कि एक खुशहाल भविष्य के लिए किसी भी जहरीले (Toxic) रिश्ते से बाहर निकलना साहस का काम है, शर्म का नहीं। 

5. समाज की मिश्रित प्रतिक्रिया

जहाँ एक ओर इस कदम की व्यापक सराहना हो रही है, वहीं सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे पारिवारिक संस्था के लिए चुनौती भी मान रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलती मानसिकता का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति की खुशी को पुरानी परंपराओं से ऊपर रखा जा रहा है। 

“मेरठ की इस घटना ने समाज के सामने एक बड़ी लकीर खींच दी है। आज प्रणिता के पिता ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर यह साबित कर दिया कि बेटियों का मान-सम्मान किसी भी सामाजिक रूढ़ि से कहीं ऊपर है। उनका यह कदम उन तमाम पिताओं के लिए एक मिसाल है जो समाज के डर से अपनी बेटियों को घुट-घुट कर जीने पर मजबूर कर देते हैं। याद रखिए, बेटियां बोझ नहीं, परिवार का अभिमान होती हैं। सावधान नेशन न्यूज 

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