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सावधान नेशन न्यूज़

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: पहले चरण में टूटा मतदान का रिकॉर्ड, 2011 का ऐतिहासिक आंकड़ा भी पीछे छूटा


25 April 2026 | सावधान नेशन न्यूज़ कोलकाता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण ने लोकतंत्र के उत्सव में एक नया अध्याय लिख दिया है। चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, गुरुवार को हुए मतदान में वोटर टर्नआउट (मतदान प्रतिशत) ने राज्य के चुनावी इतिहास के पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। इससे पहले सर्वाधिक मतदान का रिकॉर्ड 2011 के ऐतिहासिक चुनाव के नाम था, जब 84.72% वोटिंग हुई थी और सत्ता परिवर्तन के साथ ममता बनर्जी ने वामपंथी शासन का अंत किया था।

प्रवासी मजदूरों और पेशेवरों की घर वापसी बनी चर्चा का केंद्र
इस बार के चुनाव की सबसे खास बात समाज के हर तबके की सक्रिय भागीदारी रही। विशेषज्ञों के अनुसार, मतदान के लिए राज्य में अभूतपूर्व ‘घर वापसी’ देखी गई। उच्च-पदस्थ पेशेवरों से लेकर प्रवासी मजदूरों तक, वोट डालने के लिए लोगों में जबरदस्त उत्साह रहा। चुनाव से दस दिन पहले ही ट्रेनों, बसों और उड़ानों के टिकट मिलना मुश्किल हो गया था। हावड़ा, सियालदह और न्यू जलपाईगुड़ी जैसे प्रमुख स्टेशनों पर पैर रखने की जगह नहीं थी।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू
भारी मतदान के बीच राजनीतिक सरगर्मी भी तेज हो गई है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है कि भाजपा ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए प्रवासी मजदूरों को घर लाने के लिए विशेष ट्रेनों की व्यवस्था की। हालांकि, अच्छी बात यह रही कि कुछ छिटपुट झड़पों को छोड़कर, किसी भी दल ने बूथ कैप्चरिंग या धांधली जैसे गंभीर आरोप नहीं लगाए हैं।

विशेषज्ञों की राय
तीन दशकों से बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार बिस्वजीत भट्टाचार्य और अन्य विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से ही उमड़ी लंबी कतारें किसी बड़े राजनीतिक संकेत की ओर इशारा कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समाज के हर वर्ग का इस तरह बाहर निकलना राज्य की राजनीति के लिए एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है।

पहले चरण में 92.88% ‘बंपर’ वोटिंग, भीषण गर्मी के बावजूद नंदीग्राम से शीतलकुची तक टूटा रिकॉर्ड

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लोकतंत्र की ऐसी लहर देखी गई जिसने इतिहास के पन्नों को पलट दिया है। चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, गुरुवार 23 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान में कुल 92.88 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई है। यह आंकड़ा न केवल पश्चिम बंगाल, बल्कि देश के चुनावी इतिहास के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।

41 डिग्री के टॉर्चर पर भारी पड़ा उत्साह

गुरुवार को राज्य के कई हिस्सों में पारा 41 डिग्री सेल्सियस के पार था, लेकिन तपती धूप भी वोटरों के हौसले नहीं डिगा सकी। आमतौर पर गर्मी के कारण लोग सुबह जल्दी या दोपहर बाद निकलते हैं, लेकिन इस बार सुबह से ही बूथों पर मतदाताओं की अटूट कतारें देखी गईं, जो वाकई अभूतपूर्व है।

नंदीग्राम में शांतिपूर्ण मतदान, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रिकॉर्ड वोटिंग
अतीत में राजनीतिक हिंसा के लिए चर्चित रहे नंदीग्राम से इस बार राहत भरी तस्वीर आई। यहाँ मतदान पूरी तरह सामान्य और शांतिपूर्ण रहा। वहीं, आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मुस्लिम बहुल सीटों पर वोटिंग का प्रतिशत बेहद ऊंचा रहा:

शीतलकुची: 97.53%
भगवानगोला: 96.95%
चोपड़ा: 96.02%
मोथाबाड़ी और जंगीपुर: 95% से अधिक

हिंदू बहुल जिलों में भी 90 पार
भारी मतदान का यह रुझान केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, जलपाईगुड़ी और पुरुलिया जैसे हिंदू बहुल और अल्पसंख्यक आबादी वाले जिलों में भी मतदान का स्तर 90 प्रतिशत के पार रहा। यहां तक कि डोमकल और कुमारगंज जैसे इलाके, जहां सुबह झड़पों की खबरें आई थीं, वहां भी अंततः 95% से ज्यादा वोट पड़े।

क्या हैं इसके सियासी मायने?
प्रवासी मजदूरों की रिकॉर्ड घर वापसी और समाज के हर वर्ग की इस ‘महा-भागीदारी’ ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। 2011 का 84.72% का रिकॉर्ड टूटना इस बात का संकेत है कि जनता किसी बड़े मुद्दे या बदलाव के पक्ष में मजबूती से खड़ी है।

वोटर लिस्ट से नाम कटने का डर और नागरिकता की चिंता, रिकॉर्ड मतदान की असली वजह?

पश्चिम बंगाल में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच एक दिलचस्प और गंभीर राजनीतिक पैटर्न देखने को मिल रहा है। राज्य का राजनीतिक माहौल सिर्फ सत्ता के संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वोटर लिस्ट’ में सुधार (SIR) और करीब 91 लाख नामों को सूची से हटाने की चर्चाओं ने आम मतदाताओं के बीच एक गहरी चिंता पैदा कर दी है।

इस डर और असुरक्षा के माहौल ने राज्य में मतदान की दर को पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए काफी ऊपर पहुंचा दिया है।

क्यों बढ़ रहा है मतदान? डर या अधिकार की लड़ाई?
कई आम वोटरों का मानना है कि यदि उन्होंने इस बार वोट नहीं दिया, तो वे भविष्य की वोटर लिस्ट से स्थायी रूप से बाहर हो सकते हैं। मतदाताओं को यह डर सता रहा है कि वोटर लिस्ट से नाम कटने का सीधा असर उनकी नागरिकता के दस्तावेजों पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि मुर्शिदाबाद (फरक्का, डोमकल, बेलडांगा, भगवानगोला, जंगीपुर), मालदा (हबीबपुर), बीरभूम (हासना) और उत्तरी दिनाजपुर (चोपड़ा) जैसे इलाकों में वोटरों की भारी भीड़ देखी जा रही है।

प्रवासी मजदूरों की घर वापसी
इन क्षेत्रों की एक खास बात यह है कि यहां के निवासी बड़ी संख्या में रोजगार के लिए बाहर जाते हैं। लेकिन इस चुनाव में, प्रवासी श्रमिक एकता मंच के अनुसार, बड़ी संख्या में मजदूर केवल अपना वोट डालने के लिए वापस अपने घरों को लौट आए हैं।

प्रवासी श्रमिक एकता मंच’ के राज्य महासचिव, आसिफ फारूक ने कहा

जो लोग एसआईआर प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट में बचे रहे, वे इस बात को लेकर पक्के थे कि इस बार ज़रूर वोट डालेंगे। लोग अपनी वोटर पर्चियों की फोटोकॉपी करवा रहे हैं ताकि वे भविष्य में यह साबित कर सकें कि उनका नाम लिस्ट में था और उन्होंने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था।”

सबर इंस्टीट्यूट’ के शोधकर्ता साबिर अहमद ने भी इसकी पुष्टि की है। उन्होंने बीबीसी बांग्ला से बातचीत में कहा कि मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में भारी भीड़ इस बात का संकेत है कि लोग अपने अधिकारों को लेकर पहले से कहीं अधिक सतर्क और दृढ़ हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: ममता बनाम अमित शाह
रिकॉर्ड वोटिंग के इस आंकड़े को लेकर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस  और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी  दोनों ही अपने-अपने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं

ममता बनर्जी : मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि लोग इसे अपने अधिकारों की रक्षा की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “लोग परिसीमन, एनआरसी और इसी तरह के अन्य मुद्दों को लेकर डर के साए में जी रहे थे और अब वे अपना विरोध और समर्थन वोट के जरिए दर्ज करा रहे हैं।”

अमित शाह : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे सकारात्मक बदलाव बताया। उन्होंने कहा, “फर्जी वोटरों और घुसपैठियों के नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की सक्रियता की वजह से आज आम लोग बिना किसी डर के बाहर निकलकर वोट कर पा रहे हैं।”

फिलहाल, दोनों ही पार्टियां इस रिकॉर्ड वोटिंग का गणित समझने में जुटी हैं। दोनों खेमों के रणनीतिकार हर सीट का अलग-अलग विश्लेषण कर रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि ‘नागरिकता’ और ‘वोटर लिस्ट’ को लेकर फैला यह डर असल में किसके वोट बैंक को फायदा पहुंचाएगा।

राज्य में यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि एक ऐसा चुनाव बन गया है जहां मतदाता अपनी पहचान और नागरिकता को सुरक्षित करने के लिए खुद को ‘बूथ’ पर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

सावधान नेशन न्यूज़ कोलकाता

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