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बंगाल में कांग्रेस: गौरवशाली अतीत से अस्तित्व की जंग तक—क्या ‘बाइनरी’ राजनीति के भंवर में खो गई है पुरानी पार्टी?

60 साल की माला घोषाल की बातें पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के उस ‘कोर’ (मूल) समर्थक की आवाज़ हैं, जो हार-जीत से परे पार्टी की विचारधारा और राहुल गांधी की सादगी में विश्वास रखता है। उनकी बातों और आपके द्वारा साझा किए गए ऐतिहासिक संदर्भों को जोड़कर देखें, तो बंगाल में कांग्रेस का सफ़र एक गौरवशाली अतीत से वर्तमान के अस्तित्व के संकट तक की कहानी कहता है।

अकेले चुनाव लड़ने का दांव: आत्मसम्मान बनाम चुनावी अंकगणित
माला घोषाल का यह कहना कि अच्छा है कांग्रेस अकेले लड़ रही है पार्टी के उन कार्यकर्ताओं की भावना को दर्शाता है जो गठबंधन की राजनीति में अपनी ज़मीन खोने से थक चुके हैं।
पिछली गलतियों का सबक: 2011 में टीएमसी के साथ और 2016/2021 में वामदलों के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को कमज़ोर किया। अकेले लड़कर कांग्रेस शायद सत्ता न पाए, लेकिन वह अपना वोट शेयर और संगठनात्मक ढांचा वापस पाने की कोशिश कर रही है।
शून्य से वापसी की उम्मीद: 2021 में एक भी सीट न मिलने के बाद, इस बार कांग्रेस का लक्ष्य अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को बहाल करना और विधानसभा में अपनी आवाज़ फिर से दर्ज कराना है।

राहुल गांधी: धूर्त राजनीति में एक ईमानदार चेहरा
माला घोषाल राहुल गांधी को एक ईमानदार और संवेदनशील नेता मानती हैं। यह बंगाल के एक खास मध्यमवर्गीय तबके की सोच है जो राजनीति में आक्रामकता से ज्यादा नैतिकता को महत्व देता है।
उनका यह कहना कि धूर्त राजनीति में ऐसे नेताओं को कीमत चुकानी पड़ती है राहुल गांधी के प्रति सहानुभूति पैदा करता है। यह संकेत देता है कि कांग्रेस समर्थक उन्हें एक पीड़ित के रूप में देखते हैं, जिस पर सत्ता ने जानबूझकर प्रहार किए हैं।

कांग्रेस के पतन के ऐतिहासिक कारण

अंशात्मक बिखराव (1977-1990): इमरजेंसी के बाद वामदलों का उदय और कांग्रेस के भीतर आंतरिक गुटबाजी (जैसे सोमेन मित्रा बनाम अन्य) ने पार्टी को कमज़ोर किया।
ममता बनर्जी का निष्कासन (1997-1998): यह कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। ममता की आक्रामकता और वामदलों के खिलाफ उनका सीधा संघर्ष जनता को कांग्रेस के नरम रुख से ज्यादा पसंद आया। प्रदीप भट्टाचार्य की यह बात सही साबित हुई कि कांग्रेस उनके निष्कासन के झटके से आज तक नहीं उबर पाई है।
गठबंधन की बैसाखियाँ (2001-2021): ममता को निकालने के बाद, उन्हीं की जूनियर पार्टनर बनकर लड़ना कांग्रेस की रणनीतिक हार थी। इससे कांग्रेस का स्वतंत्र अस्तित्व खत्म होता गया और उसके गढ़ (मालदा, मुर्शिदाबाद) भी ढह गए।

वर्तमान स्थिति: एक त्रिकोणीय संघर्ष में फंसी कांग्रेस
आज बंगाल की राजनीति में भाजपा ने वही आक्रामक विपक्ष की जगह ले ली है, जो कभी ममता बनर्जी ने कांग्रेस से छीनी थी।
बीजेपी का उभार: जब कांग्रेस और वामदल कमज़ोर हुए, तो ममता विरोधी वोट सीधे भाजपा की ओर शिफ्ट हो गए।
अस्तित्व की लड़ाई: माला घोषाल जैसे समर्थकों के लिए यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि कांग्रेस की पहचान बचाने का चुनाव है।

माला घोषाल और सुहैल (जिसका जिक्र आपने पहले किया था) के विचारों में एक बड़ा अंतर है। जहाँ युवा मतदाता (सुहैल) व्यावहारिक होकर ‘बीजेपी को रोकने’ के लिए ममता को चुन रहा है, वहीं पुरानी पीढ़ी (माला घोषाल) अपनी वफ़ादारी और विचारधारा के लिए कांग्रेस के साथ खड़ी है।

एक सवाल आपके लिए: क्या आपको लगता है कि बंगाल में ‘नैतिक राजनीति’ और ‘ईमानदारी’ का कार्ड खेलकर राहुल गांधी उस युवा वोटर को अपनी ओर खींच पाएंगे, जो फिलहाल ‘सुरक्षा’ के नाम पर टीएमसी को वोट दे रहा है?

बंगाल में कांग्रेस: गौरवशाली अतीत से अस्तित्व की जंग तक—क्या ‘बाइनरी’ राजनीति के भंवर में खो गई है पुरानी पार्टी?

60 वर्षीय माला घोषाल चिलचिलाती धूप में कांग्रेस का झंडा थामे बैठी हैं। उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक है जो कांग्रेस के उस दौर में हुआ करती थी जब बंगाल की राजनीति में केवल एक ही नाम गूंजता था—कांग्रेस। आज की हकीकत से बेखबर माला कहती हैं, पिछली बार हम शून्य थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। राहुल गांधी ईमानदार और संवेदनशील नेता हैं, और हमें उनकी विचारधारा पर गर्व है।’

माला जैसे वफादार समर्थक आज भी कांग्रेस के साथ खड़े हैं, लेकिन क्या उनकी भावनाएं चुनावी आंकड़ों में बदल पाएंगी? बंगाल में कांग्रेस का सफर एक गौरवशाली विरासत से शुरू होकर आज अस्तित्व के सबसे बड़े संकट के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है।

गौरवशाली अतीत और विभाजन का दंश
एक समय था जब 1947 से 1977 तक बंगाल में कांग्रेस का एकछत्र राज था। डॉ. विधान चंद्र रॉय के नेतृत्व में राज्य के आधुनिकीकरण और कृषि उत्पादन में जो वृद्धि हुई, उसने कांग्रेस को जन-जन से जोड़ दिया था। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि शरणार्थी संकट, नक्सलवादी आंदोलन और आंतरिक गुटबाजी ने पार्टी की नींव में पहली दरारें डालीं।

1998 में ममता बनर्जी का पार्टी से बाहर जाना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। सीताराम केसरी के दौर में वामपंथियों के प्रति पार्टी का नरम रुख ममता को रास नहीं आया और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गठन कर लिया। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य के शब्दों में कहें तो, ”ममता के निष्कासन से कांग्रेस जो टूटी, वह आज तक नहीं संभल पाई है।”

गठबंधन की राजनीति: एक रणनीतिक भूल?
ममता बनर्जी को पार्टी से बाहर निकालने के बाद कांग्रेस ने जो रास्ता चुना, उसने उसकी स्वतंत्र पहचान को ही मिटा दिया। 2001 में टीएमसी के साथ गठबंधन, 2011 में वामदलों के खिलाफ टीएमसी का सहारा और 2016 में वामदलों के साथ तालमेल—इन गठबंधनों ने कांग्रेस के चुनावी आंकड़ों को अस्थिर कर दिया। 1996 में 82 सीटों पर रहने वाली कांग्रेस, 2021 तक आते-आते एक भी सीट न जीत पाने के कगार पर पहुंच गई।

प्रोफेसर मतीन के अनुसार, ममता बनर्जी ने हमेशा कांग्रेस को सीपीआई (एम) के सामने कमतर माना। उन्होंने कांग्रेस की उस कमजोरी को भांप लिया था, जहां पार्टी बूथ मैनेजमेंट और जमीनी लड़ाई में पीछे छूट रही थी। ममता ने कांग्रेस की उसी ‘सॉफ्ट’ राजनीति के खिलाफ ‘आक्रामक’ रुख अपनाया और देखते ही देखते कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर कब्जा कर लिया।

बाइनरी राजनीति का जाल: TMC बनाम भाजपा
आज बंगाल की राजनीति ‘बाइनरी’ (Binary) बन गई है—एक तरफ टीएमसी और दूसरी तरफ भाजपा। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग, जैसे युवा सुहैल, राहुल गांधी को पसंद तो करता है, लेकिन वोट टीएमसी को देता है। क्यों? क्योंकि उन्हें डर है कि टीएमसी की हार का मतलब ‘भाजपा का शासन’ है।

बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सुभांकर सरकार इस स्थिति को ‘बाइनरी की पॉलिटिक्स’ कहते हैं। उनके अनुसार, दोनों बड़ी पार्टियों ने मिलकर ऐसी धारणा बना दी है कि जनता को लगता है कि इनके अलावा कोई तीसरा विकल्प ही नहीं है।

भविष्य की चुनौती: वजूद की लड़ाई
कांग्रेस के लिए यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि खुद को ‘प्रासंगिक’ बनाने की लड़ाई है। 2021 के चुनावों में कांग्रेस का सफाया होना इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन की बैसाखियां अब काम नहीं कर रही हैं।

आज का कार्यकर्ता, जैसे माला घोषाल, राहुल गांधी के ‘ईमानदार और सेक्युलर’ होने के भरोसे पार्टी के साथ है। लेकिन क्या यह ‘ईमानदारी’ का नैरेटिव बंगाल की आक्रामक चुनावी पिच पर टिक पाएगा? कांग्रेस इस बार अकेले चुनाव लड़कर अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है। अगर वह इस ‘बाइनरी’ के चक्रव्यूह को तोड़ पाई, तो यह उसकी सबसे बड़ी वापसी होगी; अन्यथा, यह महज एक विचार बनकर रह जाएगी।

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